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वादियां मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें .. .. .. ..

गाड़ी अटक-अटककर ही चल रही थी। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जब समय खराब होता है, तो हर पांसा उल्टा पड़ता जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अब तक कड़ा बयान देकर बचते रहे हैं। हालांकि, जब समय की चाल उल्टी पड़ती है, तो दोनों चुनाव आयुक्त अचानक मोर्चे पर आ गए। दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी सहमति के बिना ही अनेक फैसले लिए गए हैं। हालांकि, उन्होंने खुलकर यह बात नहीं कही, लेकिन एक अखबारी रिपोर्ट में जब इसका खुलासा हुआ, तो मानो टाइम बम फट गया।

पहले हर मौके पर तुरंत प्रतिक्रिया देने वाले ज्ञानेश कुमार इस बार चुप्पी साध चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि चुनाव आयोग पर लगे आरोपों पर जो कुछ भी कहा जा रहा है, वह सब ‘सूत्रों’ के माध्यम से सामने आ रहा है। आखिर ये सूत्र कौन हैं? किसी को नहीं पता। खबरें छापने वाले मीडिया संस्थानों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे यह स्पष्ट करें कि उनके सूत्र कितने भरोसेमंद हैं।

अन्यथा, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ने जो कहा था, वह जनता भूली नहीं है। अब पूरी प्रक्रिया को चुनाव आयोग में केंद्रित रखने वाले सॉफ्टवेयर में ‘सीमा जी’ का भी नाम सामने आ गया है, जिससे जाहिर है कि धीरे-धीरे उनकी भी कुंडली खुलेगी। इसके अलावा, चुनाव आयोग और नोएडा डीएम से जुड़े मामलों में जज साहब की परतें भी उधड़ने लगी हैं।

मजेदार बात यह है कि हर बात पर विपक्ष पर आक्रामक हमले करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ-साथ अन्य भाजपा प्रवक्ता भी इन मुद्दों पर पूरी तरह मौन हैं। मोदी जी भजन संध्या में शामिल होकर तालियां बजा रहे हैं, तो अमित शाह परोक्ष रूप से राहुल गांधी को घेरने में व्यस्त हैं।

इसके बीच एक अघोषित सत्य यह उभरकर आ रहा है कि सरकार के भीतर बैठे कुछ लोग भी अब शीर्ष नेतृत्व के कामकाज से असंतुष्ट हैं। यह स्पष्ट है कि बिना किसी अंदरूनी खुन्नस या असंतोष के इस तरह की बातें बाहर नहीं आतीं। जब सत्ता बदलती है, तब फाइलें खुलती हैं और नए-नए राज़ सामने आते हैं। इसी बीच यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि मुख्यधारा के टीवी मीडिया का भविष्य क्या होगा? अब तक जिस निष्ठा के साथ ये मीडिया घराने और मोदी समर्थक एंकर सरकार के पक्ष में खड़े रहे हैं, वे भविष्य में क्या रुख अपनाएंगे?

इसी बात पर एक फिल्मी गीत याद आता है। वर्ष 1968 में बनी फिल्म अभिलाषा के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था आर डी वर्मन ने। इसे मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था।गीत के बोल इस तरह हैं।

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें

जाओ, मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें

जाओ, मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे

वादियाँ मेरा दामन…

जब चुराओगे तन तुम किसी बात से

जब चुराओगे तन तुम किसी बात से

शाख-ए-गुल छेड़ देगी मेरे हाथ से

अपनी ही ज़ुल्फ़ को और उलझाओगे

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें

जाओ, मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे

वादियाँ मेरा दामन…

जब से मिलने लगी तुमसे राहें मेरी

जब से मिलने लगी तुमसे राहें मेरी

चाँद सूरज बनी दो निगाहें मेरी

तुम कहीं भी रहो, तुम नज़र आऐगे

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें

जाओ, मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे

वादियाँ मेरा दामन…

इससे आगे चलते हैं कि हमें नजर आता है कि अदालतों की बहस में केंद्रीय एजेंसियों के दावे अब नकारे जाने लगे हैं। यानी केंद्रीय एजेंसियों के जरिए बांह मरोड़ने की तकनीक भी विफल होने लगी है। ऐसे में किस किस ने स्विटजरलैंड या यूरोप के दूसरे देशों में दूसरे माध्यमों से अपनी अपनी संपत्ति बनायी है, उनकी चिंता स्वाभाविक है। सरकार गयी तो गड़े मुर्दे उखाड़े जाएंगे।

तो क्या इनलोगों का हाल भी नीरव मोदी और विजय माल्या जैसा हो जाएगा जो विदेशों में बैठकर अपनी भारतीयता साबित करेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि भारत लौटने पर उन्हें लालघर (जेल) ही जाना होगा। सरकार के सामने अब प्राब्लम यह है कि वह किन किन छेदों को बंद करें। कहीं न कहीं से सूचना का पानी लीक कर रहा है। अंदर इतना कुछ भरा पड़ा है जो बाहर आ गया तो लेने के देने पड़ जाएंगा। ऊपर से भय यह भी सता रहा है कि जनता का मिजाज भांपकर कहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने तेवर बदल लिये तो एसआईआर के नाम पर जो खेल हुआ है, उसका भी भांडा फूट जाएगा। जब नाराज जनता सड़कों पर उतरती है तो सत्तारूढ़ दल के नेताओँ का क्या हाल होता है, यह तो देश ने आपातकाल के अंतिम चरण में देख रखा है।