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जेपीएससी की चौखट पर सुलगता झारखंड: पेपर लीक

झारखंड की आबोहवा इन दिनों एक बार फिर सुलग रही है। देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए उग्र प्रदर्शनों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की गूंज अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब झारखंड की धरती पर भी विरोध के स्वर तीखे हो चले हैं। राज्य में झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों, धांधली और भ्रष्टाचार ने युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।

यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा या एक सत्र का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस सड़े-गले तंत्र के खिलाफ एक सामूहिक आक्रोश है जिसने पिछले ढाई दशकों से राज्य के मेधावी और योग्य युवाओं के भविष्य को दीमक की तरह चाट रखा है। इस वर्तमान आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल हालिया गड़बड़ियों पर ही सवाल नहीं उठाए जा रहे, बल्कि इतिहास के वे पन्ने भी पलटे जा रहे हैं जिन्हें सत्ता के गलियारों में धूल में दबा दिया गया था।

आंदोलनकारियों और छात्र संगठनों द्वारा अब उन ‘गड़े हुए मुर्दों’ को उखाड़ा जा रहा है, जो यह उजागर करते हैं कि कैसे और किस प्रकार राज्य के वीआईपी, ताकतवर नेताओं, नौकरशाहों और रसूखदारों के रिश्तेदार व करीबी लोग जेपीएससी की चौखट को पार कर सीधे सरकारी कुर्सियों पर जा बैठे। पारदर्शिता के दावों के बीच यह एक खुला रहस्य बनता जा रहा है कि कैसे योग्य युवाओं की मेहनत को दरकिनार कर अपनों को रेवड़ियों की तरह पद बांटे गए।

उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी, कॉपियों के मूल्यांकन में मनमानी और इंटरव्यू के अंकों में भारी अंतर जैसे गंभीर आरोप इस आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार लगते रहे हैं। जब आम छात्र दिन-रात एक कर लाइब्रेरी की चारदीवारी में अपनी जवानी खपा रहा होता है, तब पिछले दरवाजे से आने वाले ये तथाकथित ‘विशेषज्ञ’ महकमों की कमान संभाल रहे होते हैं। यह स्थिति न केवल झारखंड के युवाओं के साथ क्रूर मजाक है, बल्कि संविधान के समानता के अधिकार का भी खुला उल्लंघन है।

जेपीएससी का गठन झारखंड राज्य के गठन के साथ ही यहाँ के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद के रूप में हुआ था, लेकिन यह संस्था अपनी स्थापना के शुरुआती दिनों से ही विवादों के साए में घिर गई थी। चाहे वह प्रथम जेपीएससी की नियुक्तियों में हुआ बड़ा घोटाला हो, या फिर हालिया सिविल सेवा परीक्षाओं के दौरान सामने आए पेपर लीक के सनसनीखेज मामले, आयोग ने बार-बार अपनी विश्वसनीयता खोई है। हर बार सत्ता परिवर्तन के बाद यह उम्मीद जगाई जाती है कि व्यवस्था को दुरुस्त किया जाएगा, दोषियों पर नकेल कसी जाएगी और एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया स्थापित होगी।

हालांकि, धरातल पर तस्वीर जस की तस बनी हुई है। परीक्षा का विज्ञापन निकलना, फॉर्म भरना, परीक्षा तिथि का टलना, पेपर लीक होना, फिर अदालत के चक्कर काटना और अंततः छात्रों का हताश होकर आंदोलन की राह पकड़ना—झारखंड के विद्यार्थियों की यह एक स्थायी नियति सी बन गई है। पेपर लीक और अयोग्य लोगों का चयन कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है जहाँ मेधा का गला घोंटा जाता है। आज झारखंड का युवा वर्ग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। राज्य के सुदूर गाँवों से निकलकर रांची की तंग गलियों में रहकर तैयारी करने वाले एक छात्र के लिए जेपीएससी की तैयारी केवल एक नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार के संघर्षों का प्रतिशोध और सम्मान की लड़ाई होती है।

जब उस सपने को चंद रुपयों के लिए पेपर लीक करने वाले दलालों और भाई-भतीजावाद की भेंट चढ़ा दिया जाता है, तो आक्रोश का फटना स्वाभाविक है। जंतर-मंतर के हालिया आंदोलनों से प्रेरणा लेते हुए झारखंड के छात्रों और आम नागरिकों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। यह आंदोलन केवल जेपीएससी के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता के खिलाफ है जो योग्यता को कुचलकर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देती है।

यदि समय रहते सरकार और आयोग ने इस दिशा में कोई ठोस, निष्पक्ष और पारदर्शी कदम नहीं उठाया, तो यह चिंगारी एक ऐसे दावानल का रूप ले सकती है जिसे शांत करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। झारखंड के युवाओं का सब्र अब जवाब दे चुका है, और उन्हें अब खोखले आश्वासनों के बजाय सिर्फ और सिर्फ ठोस न्याय चाहिए। अब तक सरकार ने ठीक केंद्र सरकार की तरह ही मामले को टालने वाला रवैया अपना रखा है। सरकारी अधिकारी भी जानते हैं कि गहन जांच की स्थिति में यह हाथ कई वीआईपी हाथों को भी जला सकती है। लेकिन सरकार को चाहिए कि इस आग के और भड़कने से पहले वह इसे शांत करने की पहल करें।