नई पीढ़ी के विरोध में पुराने नियम नहीं चलेंगे
1985 की लोकप्रिय हिंदी फिल्म अर्जुन में सनी देओल ने मुख्य भूमिका निभाई थी। अर्जुन सामाजिक मानदंडों को तोड़ता है और अपने आसपास के गुंडों से मुकाबला करते हुए हिंसा से भी पीछे नहीं हटता। उसकी इस निराशा और गुस्से का फायदा एक भ्रष्ट राजनीतिज्ञ उठाता है, जो अर्जुन के उसी पर हावी होने से पहले उसका इस्तेमाल करना चाहता है।
हमने पिछले एक महीने से अधिक समय में राष्ट्रीय राजधानी में पीढ़ीगत आक्रोश के ऐसे ही एक नए रूप को देखा है। दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर, एक चरमराती परीक्षा प्रणाली के खिलाफ आंदोलन का केंद्र बन गया। राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं के बार-बार लीक होने से आहत और निराश युवा छात्रों ने देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की।
जेन-ज़ी, जिसे अक्सर अपने स्मार्टफोन से अत्यधिक लगाव के लिए आंका जाता है, ने अपने उस स्मार्टफोन को ही एकजुटता और विरोध का एक ऐसा हथियार बना दिया, जिसने एक उज्ज्वल भविष्य पर मंडराते परीक्षा प्रणाली के संकट का डटकर मुकाबला किया। उनकी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं थी जिसकी उम्मीद पुरानी पीढ़ियों—विशेषकर 1980 के दशक से पहले पैदा हुए लोगों—ने की होगी।
प्रधान के इस्तीफे की मांग करने वाले इन प्रदर्शनों ने न केवल नए नारे गढ़े, बल्कि विरोध व्यक्त करने के व्याकरण, शब्दावली और शैली को भी पूरी तरह बदल दिया। जब उनका यह आक्रोश बाहर छलककर आया, तो वह मीम्स, चुटकुलों, व्यंग्य, रीमिक्स वीडियो और सबसे खास तौर पर कड़वी शब्दावली के रूप में सामने आया। जल्द ही लोगों का ध्यान छात्रों के आक्रोश के कारणों से हटकर उस भाषा पर चला गया जिसमें इसे व्यक्त किया जा रहा था।
कुछ लोगों को इस बात से ठेस पहुंची कि जेन-ज़ी के प्रदर्शनकारी अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ किए जाने पर सवाल पूछते समय पर्याप्त रूप से विनम्र नहीं थे। उनकी भाषा को अनुचित और अपमानजनक माना गया, विशेष रूप से स्वयं प्रधानमंत्री के प्रति। भाषा को लेकर जताई गई यह शिकायत शायद स्वाभाविक ही है। इसे सामाजिक विकास के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है: हर पीढ़ी अपने बाद आने वाली पीढ़ी की भाषा, प्राथमिकताओं, संगीत, संस्कृति और नैतिक मूल्यों में खामियां ढूंढती ही है।
जेन-ज़ी ने पुराने जमाने की औपचारिकताओं और शिष्टाचार को दरकिनार करने का फैसला किया। समाज और प्राधिकारियों ने अक्सर अभिव्यक्ति के इन नए और अपरिचित तरीकों को नैतिक पतन का संकेत मान लेने की भूल की है। जंतर-मंतर पर हुआ यह धरना इंस्टाग्राम के माध्यम से संचालित एक धरातलीय विरोध-प्रदर्शन था।
विरोध में विनम्रता की मांग करने के बजाय, यह पूछना अधिक उपयुक्त होगा कि यह पीढ़ी अपना असंतोष जताने के लिए पारंपरिक तरीकों से दूर क्यों चली गई है? युवा प्रदर्शनकारी अब अपने गुस्से को पारंपरिक मीडिया की कृत्रिम और अत्यधिक अनुकूलित भाषा के माध्यम से व्यक्त करने के लिए बाध्य क्यों महसूस नहीं कर रहे हैं? शुरुआती आश्चर्य के बाद, विरोध की इस नई भाषा को देखकर लोग अपनी वैचारिक स्थिति के अनुसार हैरान हुए या फिर इसके मुरीद बन गए।
मीम्स वह भाषा हैं जिसे जेन-ज़ी समझती है और वर्ष 2026 में इस्तेमाल करना पसंद करती है। यह भाषा अधिकारियों और समाज को डराती है क्योंकि यह विकेंद्रीकृत, गुमनाम, आसानी से साझा की जा सकने वाली और सेंसरशिप से मुक्त है। इसका मतलब यह नहीं है कि सत्ता इस पर नियंत्रण पाने की कोशिश नहीं करती। प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बनाने, उपयोगकर्ताओं या सामग्री को सेंसर करने या संदेशों को रोकने के लिए, वह आज भी उसी पुरानी प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग करती है जो कभी पारंपरिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए की जाती थी।
पुलिस अधिकारी इसे खारिज कर सकते हैं, नौकरशाह इसे सेंसर करने का प्रयास कर सकते हैं, व्हाट्सएप ग्रुपों के बड़े-बुजुर्ग इसे नापसंद कर सकते हैं और राजनीतिज्ञ इसकी बराबरी करने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन उन सभी को यह महसूस करना होगा कि यह दुनिया अब किसी और की है, जिसमें वे केवल किराएदार मात्र हैं।
पुरानी पीढ़ियों ने जेन-ज़ी को जो दुनिया सौंपी, उसमें उसकी कोई राय नहीं ली गई थी। इसलिए, पुरानी पीढ़ियों की आलोचना करने के लिए यह नई पीढ़ी जिस भाषा का प्रयोग करती है, उस पर भी पुरानी पीढ़ियों का कोई नियंत्रण या अधिकार नहीं होना चाहिए। अगर अब भी पुरानी तकनीक पर ऐसे आंदोलनों को आंका गया तो यह जेनरेशन गैप की गड़बड़ी होगी। इस पीढ़ी को वर्तमान सोच के लिहाज से समझना होगा और उनके गुस्से का निराकरण करना होगा। टालने की स्थिति फिर से भीषण हिंसा के दौर को प्रारंभ कर सकती है, जिसकी थोड़ी झलक हमें देखने को मिल चुकी है।