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राज अस्पताल से पुलिस के प्रेम का राज क्या ?

राष्ट्रीय खबर विशेष

सरकारी अस्पतालों में अधिक सुविधा के बाद भी प्राइवेट ही क्यों

  • हेलीकॉप्टर से एयरलिफ्ट होते हैं जवान

  • सरकारी अस्पतालों में बेहतर ईलाज है

  • शहर में दूसरे निजी अस्पताल में मौजूद

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियानों और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर तैनात पुलिस के जवान अक्सर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। पूरे राज्य में जहां कहीं भी पुलिस के जवान मुठभेड़ या किसी बड़े हादसे में गंभीर रूप से चोटिल होते हैं, उन्हें तुरंत बेहतर और त्वरित इलाज के लिए राजधानी रांची लाया जाता है।

सिंहभूम का सुदूर जंगली इलाका हो या राज्य का कोई अन्य कोना, विपरीत परिस्थितियों में जवानों की जान बचाने के लिए राज्य सरकार के हेलीकॉप्टरों से उन्हें तत्काल एयरलिफ्ट किया जाता है। एयरलिफ्ट करने का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि बिना समय गंवाए जवानों को सबसे आधुनिक और जीवन रक्षक चिकित्सा प्रणाली उपलब्ध कराई जा सके।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की गहराई से छानबीन करने पर एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला तथ्य सामने आ रहा है। रांची पहुंचने वाले अधिसंख्य घायल जवानों को सीधे तौर पर एक खास निजी अस्पताल—राज अस्पताल—में ही भर्ती कराया जाता है। सवाल उठता है कि जब जवानों की जिंदगी का सवाल है, तो उन्हें एक ऐसे अस्पताल के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाता है जो चिकित्सा जगत की कई अत्याधुनिक सुविधाओं से आज भी वंचित है? यह एक बेहद प्रासंगिक और गंभीर सवाल है, जिसका सीधा और स्पष्ट उत्तर राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय के वरीय अफसरों को देना चाहिए।

हाल के दिनों में इलाज में गंभीर विसंगतियों और लापरवाही के आरोपों को लेकर स्थानीय राज अस्पताल काफी चर्चा और विवादों में रहा है। अगर इन तात्कालिक विवादों को अलग भी रख दिया जाए, तो भी यह कड़वा सच सामने आता है कि खास तौर पर नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में घायल होने वाले लगभग सभी जवानों का इलाज इसी विशिष्ट अस्पताल में कराया जाता है। इस मद में पुलिस विभाग द्वारा हर साल लाखों-करोड़ों रुपये का भुगतान किया जा रहा है। पुलिस विभाग का इस एक अस्पताल पर इतना अधिक खर्च करना और इसके पीछे की वित्तीय प्रक्रिया क्या है, यह निश्चित रूप से एक उच्च-स्तरीय जांच और वित्तीय ऑडिट का विषय है।

आम जनता और राजनीतिक गलियारों में यह बात जगजाहिर है कि इस अस्पताल के संचालक योगेश गंभीर, एक मेडिकल उपकरणो के आपूर्तिकर्ता संजय कश्यप और पुलिस मुख्यालय के कई उच्चाधिकारियों को अक्सर सार्वजनिक स्थलों, बैठकों और वीआईपी कार्यक्रमों में एक साथ देखा जाता है। अधिकारियों और व्यापारी के बीच की यह करीबी ही इस पूरे मामले को संदिग्ध बनाती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या घायल जवानों के इलाज के नाम पर मिलने वाले इस भारी-भरकम फंड के पीछे कोई बड़ा वित्तीय घालमेल या ‘सांठगांठ’ चल रही है?

यह स्थिति तब और भी ज्यादा विचारणीय हो जाती है जब हम रांची में उपलब्ध अन्य चिकित्सा विकल्पों को देखते हैं। निजी क्षेत्र की ही बात करें तो रांची में राज अस्पताल से कहीं बेहतर, सर्वसुविधायुक्त और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल मौजूद हैं, जहां सुपर-स्पेशियलिटी इलाज की व्यवस्था है।

दूसरी तरफ, खुद राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार यह बड़े दावे करते आए हैं कि सरकारी तंत्र अब किसी से पीछे नहीं है। राजधानी में स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान के अलावा, अब रांची के सदर अस्पताल का भी पूरी तरह से कायाकल्प हो चुका है।