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चुप तुम रहो चुप हम रहें

कहते हैं कि कलयुग में भगवान सीधे नहीं आते, वे अपने प्रतिनिधियों को भेजते हैं। हमारे देश में इन प्रतिनिधियों की एक भारी-भरकम फौज है। कोई सुबह-सुबह टीवी पर आकर कपालभाति कराते हुए देश का सिस्टम ठीक करने का दावा करता है, तो कोई व्यासपीठ पर बैठकर ऐसी रामकथा सुनाता है कि सुनने वालों की आंखों से आंसुओं की गंगा बहने लगती है।

कोई हरिद्वार के घाटों पर ऐसी दिव्य आरती उतारता है कि साक्षात देवलोक का भ्रम होने लगे। इन सब महापुरुषों में एक बात सामान्य थी—इनके पास दुनिया की हर समस्या का समाधान था। शेयर बाजार गिरने से लेकर घुटनों के दर्द तक, और वैश्विक अशांति से लेकर पड़ोसी देश की नापाक हरकतों तक, हमारे ये पूज्य संत हर विषय पर कड़क और सटीक राय रखते आए हैं। लेकिन, हाल ही में जब अयोध्या के राम मंदिर के दानपात्र से रोज छह-आठ लाख रुपये सर्कुलेट होने यानी गायब होने की खबर आई, तो देश के आध्यात्मिक गलियारे में एक ऐसी दिव्य और अलौकिक खामोशी छा गई है, जिसकी तलाश में लोग सालों कंदराओं में भटकते हैं। इसे कहते हैं—सच्ची आत्मिक शांति!

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इस महा-चोरी पर हर तरफ बवाल है। विपक्ष सुप्रीम कोर्ट दौड़ रहा है, पुलिस और एसआईटी माथापच्ची कर रही है, और जनता हैरान-परेशान है कि प्रभु के घर में भी शॉपिंग बैग लेकर सेंधमारी हो रही है। इस शोर-शराबे के बीच सबसे मजेदार दृश्य उन लोगों का है, जो खुद को हिंदू धर्म का सोल प्रोप्राइटर यानी एकमात्र ठेकेदार समझते हैं। धर्म के इन झंडाबरदारों के लाउडस्पीकर अचानक म्यूट मोड पर चले गए हैं।

जो गुरुदेव कल तक मंच से दहाड़ रहे थे कि धर्म की रक्षा के लिए प्राण भी देने पड़े तो पीछे मत हटना, वे आज सुबह जब कैमरे के सामने आए, तो उन्होंने अनुलोम-विलोम की गति इतनी तेज कर दी कि पत्रकार बेचारा सवाल पूछने की हिम्मत ही नहीं कर पाया। शायद गुरुजी का नया योग सूत्र कहता है—सांस खींचो, सांस छोड़ो, और जब चंदे की चोरी पर सवाल हो, तो सीधे समाधि में चले जाओ। योग से निरोग करने का दावा करने वाले हमारे इन राष्ट्र-गुरुओं को शायद लगता है कि इस वित्तीय अपच का इलाज किसी चूर्ण से नहीं हो सकता, इसलिए चुप रहने में ही परम भलाई है।

वहीं, दूसरी तरफ हमारे कथावाचक प्रभु हैं। इनकी कथाओं में राम जी के वनवास पर जाने के दृश्य को सुनकर पूरा पंडाल रो पड़ता है। मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों पर ये घंटों नॉन-स्टॉप बोल सकते हैं। लेकिन जैसे ही किसी ने माइक बढ़ाना चाहा कि महाराज, राम जी के नाम पर आए चढ़ावे में जो हाथ साफ किया गया है, उस पर दो शब्द?, महाराज ने तुरंत मौन व्रत धारण कर लिया।

इसी बात पर वर्ष 1996 में बनी फिल्म इस सुबह की रात नहीं का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था निदा फाजली ने और संगीत मे ढाला था एम एम कीरावनी ने। इसे के एस चित्र और एम एम कीरावानी ने अपनी स्वर दिया था। इस गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

चुप तुम रहो, चुप हम रहें  चुप तुम रहो, चुप हम रहें

एक बात है जो होंठों पे है,  वो दोनों कहें

चुप तुम रहो,  चुप हम रहें

चुप तुम रहो…

जागे हैं सोए नहीं, खोए हैं रोए नहीं

जागे हैं सोए नहीं, खोए हैं रोए नहीं

एक प्यार की अनकही दास्ताँ,

हम तुम सहें

चुप तुम रहो, चुप हम रहें

चुप तुम रहो…

साँसों में चलती हुई, सुलगती पिघलती हुई

साँसों में चलती हुई, सुलगती पिघलती हुई

इस आग में आ बुझें, या इसी में बहें

चुप तुम रहो, चुप हम रहें

एक बात है जो होंठों पे है,

वो दोनों कहें चुप तुम रहो, चुप हम रहें चुप तुम रहो…

चोरी के इस खेल में आरोपी जब पकड़े गए, तो पता चला कि पैसे मंदिर के पास वाले पार्क में बांटे जाते थे। कितना पवित्र और पारदर्शी तरीका था! जब तक बात दूसरों की कमियां निकालने की हो, तो ये संत अल्टीमेट फाइटर बन जाते हैं, लेकिन जब घर के भीतर ही राम-नाम की लूट मच जाए, तो ये मौन बाबा बन जाते हैं।

नेताओं का समझ आता है, वे नफा-नुकसान देखकर बोलते हैं। लेकिन इन संतों का क्या, जो मोक्ष का टिकट बांटते हैं? असल में, इस चुप्पी के पीछे एक गहरा बिजनेस मॉडल और डर है। कहीं कुछ बोलने से किसी बड़े यजमान का दिल न दुख जाए, कहीं सत्ता का कोपभाजन न बनना पड़े। इसलिए, धर्म की रक्षा का झंडा अब सिर्फ आम जनता के हिस्से आया है, जो धूप में लाइन लगाकर सौ-पचास रुपये दान करती है और बाद में अखबार में पढ़ती है कि उसके पुण्य की मलाई कोई और खा गया।