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Allahabad High Court: ‘भारी मन से दे रहे जमानत’—अधूरी DNA रिपोर्ट पर भड़का इलाहाबाद हाईकोर्ट; UP सरकार को फटकार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की वैज्ञानिक जांच प्रणाली को लेकर एक बेहद गंभीर और आंखें खोल देने वाली टिप्पणी की है. कोर्ट ने रेप और हत्या के एक अत्यंत संवेदनशील मामले में पुख्ता वैज्ञानिक सबूतों (Scientific Evidence) के अभाव के कारण मुख्य आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया. इस सुनवाई के दौरान माननीय अदालत ने उत्तर प्रदेश की फॉरेंसिक जांच व्यवस्था की बदहाली पर गहरी चिंता और मलाल जाहिर किया. कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि वह ‘भारी मन’ के साथ आरोपी को जमानत देने के लिए मजबूर है, क्योंकि अभियोजन पक्ष और जांच एजेंसियां वैज्ञानिक सबूतों के सहारे आरोपी को इस जघन्य अपराध से जोड़ने में पूरी तरह असफल रही हैं. कोर्ट ने राज्य सरकार की फॉरेंसिक लैब की लचर स्थिति पर कड़ी नाराजगी जाहिर की.

🔬 वेजाइनल स्मीयर (Vaginal Smear) की अधूरी DNA रिपोर्ट बनी वजह: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच का कड़ा रुख

इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने आरोपी मनोज की जमानत याचिका को मंजूर करते हुए कानून के तकनीकी पहलुओं को रेखांकित किया. कोर्ट ने कहा कि फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की आधिकारिक रिपोर्ट से यह कतई साबित नहीं हो सका कि मृतका के वेजाइनल स्मीयर (Vaginal Smear) में मिला DNA प्रोफाइल आवेदक (आरोपी) के ही जीन्स का है. फॉरेंसिक विफलता की मुख्य वजह लैबोरेटरी में DNA प्रोफाइल का पर्याप्त रूप से विकसित न हो पाना था. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब FSL की रिपोर्ट ही मृतका के शरीर से मिले साक्ष्यों का मिलान आरोपी से करने में असमर्थ है, तो ऐसी स्थिति में महज संदेह के आधार पर बिना किसी वैज्ञानिक सबूत के किसी नागरिक को लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रखना न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ होगा.

⚙️ ‘पुरानी मशीनें और अपर्याप्त बुनियादी ढांचा हैं असल विलेन’: अधिकांश मामलों में अधूरी रह जाती है क्रिमिनल प्रोफाइलिंग

बीते 21 मई को पारित अपने विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की फॉरेंसिक लैबोरेटरीज की बुनियादी और ढांचागत कमियों को पूरी तरह उजागर कर दिया. कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि राज्य में दर्ज होने वाले अधिकांश गंभीर आपराधिक मामलों में यही तकनीकी समस्या बार-बार सामने आती है. कोर्ट ने कहा, “उत्तर प्रदेश के अधिकांश मामलों में FSL की फाइनल रिपोर्ट यही दिखाती है कि DNA प्रोफाइल अधूरी बनने की वजह से वैजाइनल स्वैब (Vaginal Swab) में मिले जैविक साक्ष्यों का मूल स्रोत तय नहीं हो पाता है.” जस्टिस देशवाल ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि तकनीकी रूप से रिपोर्ट अधूरी रह जाने के कारण शातिर अपराधी बच निकलते हैं और जांच एजेंसियां असली गुनहगारों तक नहीं पहुंच पातीं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुरानी हो चुकी मशीनें और अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर ही इस विफलता की मुख्य वजह हैं, जिसके लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार जिम्मेदार है, क्योंकि प्रयोगशालाओं को आधुनिक वैश्विक संसाधन उपलब्ध कराना शासन का मुख्य दायित्व है.

📜 यूपी के मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री तक पहुंचेगा आदेश: हाई-एंड मशीनें और पर्याप्त स्टाफ तैनात करने के सख्त निर्देश

माननीय हाईकोर्ट ने आरोपी मनोज को सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी करते हुए यह दृढ़ उम्मीद जताई कि उत्तर प्रदेश सरकार इस फैसले से कड़ा सबक लेगी. कोर्ट ने सरकार को निर्देशित किया कि राज्य की सभी फॉरेंसिक साइंस लैब्स (FSL) को तत्काल प्रभाव से अत्याधुनिक हाई-एंड मशीनें (High-End Machines) मुहैया कराई जाएं और वहां विशेषज्ञों व पर्याप्त तकनीकी स्टाफ की कमी को दूर किया जाए. इसके साथ ही, बेंच ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (Compliance) को एक विशेष और सख्त निर्देश दिया कि इस ऐतिहासिक आदेश की एक प्रामाणिक प्रतिलिपि (Copy) उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को तुरंत भेजी जाए, ताकि वे इस संवेदनशील विषय को सीधे मुख्यमंत्री के संज्ञान में ला सकें और व्यवस्था में सुधार के लिए बजटीय आवंटन सुनिश्चित किया जा सके.