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Rohini Vrat 2026: जैन धर्म में क्यों खास है रोहिणी व्रत? जानें इसका महत्व, पूजा विधि और जरूरी नियम

नई दिल्ली: हिंदू और जैन धर्म में व्रतों और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है रोहिणी व्रत। जैन समुदाय में इस व्रत को बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त इस व्रत को सच्ची श्रद्धा से रखता है, उसके जीवन से दरिद्रता और मानसिक तनाव दूर होता है तथा घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। आइए जानते हैं रोहिणी व्रत का महत्व, पूजा विधि और इसे 3, 5 या 7 साल तक रखने के विशेष नियम क्या हैं।

🪷 रोहिणी व्रत करने की सरल विधि: सुबह स्नान से लेकर सात्विक भोजन और संयम के नियम

रोहिणी व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद मंदिर या घर के पूजा स्थल में भगवान वासुपूज्य की पवित्र प्रतिमा या चित्र के सामने शुद्ध घी का दीप जलाकर पूजा की जाती है। पूजा के दौरान फल, फूल, नैवेद्य, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं और हाथ में जल या फूल लेकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन पूर्ण उपवास रखते हैं या केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। जैन धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, इस दिन मन, वचन और कर्म से संयम, दया और अहिंसा का पालन करना बहुत ही आवश्यक माना जाता है।

📜 3, 5 और 7 साल तक व्रत रखने का नियम: संकल्प के अनुसार अवधि पूरी होने पर उद्यापन जरूरी

रोहिणी व्रत को एक विशेष अवधि तक नियमित रूप से करने का भी शास्त्रों में विधान है। आमतौर पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और शक्ति के अनुसार इसे 3, 5 या 7 सालों तक निरंतर करते हैं। इस व्रत की शुरुआत किसी भी रोहिणी नक्षत्र वाले दिन से की जाती है और जब तक संकल्पित वर्ष पूरे नहीं होते, तब तक हर महीने आने वाले रोहिणी नक्षत्र पर यह व्रत किया जाता है। अवधि पूरी होने पर इस व्रत का विधि-विधान से उद्यापन (समापन) किया जाता है, जिसमें गरीब और जरूरतमंदों को दान-पुण्य करने और जैन मंदिर में विशेष पूजा कराने की परंपरा है।