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अपना बना ले पिया: सत्ता की रूहानी प्रेम-कथा

आजकल राजनीति के गलियारों में एक ही धुन गूंज रही है—अपना बना ले पिया। यह गाना अब केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय राजनीति का राष्ट्रीय गान बन चुका है। बस फर्क इतना है कि यहाँ पिया की भूमिका में सत्ता की शीर्ष कुर्सी बैठी है और प्रेमी की भूमिका में हमारे माननीय राजनेता, जो पाला बदलने में बिजली की गति को भी मात दे देते हैं।

सबसे पहले बात करते हैं सिटी ऑफ जॉय यानी पश्चिम बंगाल की। वहां के चुनावों ने तो इस गाने को एक नया ही दार्शनिक आयाम दे दिया है। बंगाल का मतदाता इतना प्रेमी निकला कि उसने 92.88 प्रतिशत मतदान कर दिया। इतना भारी मतदान देख चुनाव आयोग भी गदगद है।

लेकिन इस प्रेम-कहानी में एक ट्विस्ट है। विपक्ष कह रहा है कि यह प्रेम जबरदस्ती वाला है, जबकि आयोग कह रहा है कि यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। जैसे रूस गए भारतीय सैनिकों के बारे में केंद्र ने कहा कि वे स्वैच्छिक अनुबंध पर गए थे, वैसे ही बंगाल के मतदाता भी शायद किसी रूहानी अनुबंध के तहत बूथों तक खिंचे चले आए।

वैसे, बंगाल की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी भी व्यंग्यात्मक लगती है कि राजाय-राजाय युद्ध होय, उलुखागड़ार प्राण जाय (राजाओं के युद्ध में आम जनता पिसा करती है)। पर इस बार तो राजाओं ने शायद युद्ध के बजाय अपना बना ले की धुन पर जुगलबंदी करने का फैसला किया है।

उधर तमिलनाडु में भी 23 अप्रैल को जनता ने अपना बना ले के सुर में सुर मिलाया। 75 हजार से ज्यादा बूथों पर शांति ऐसी थी जैसे किसी मंदिर के गर्भगृह में हो। वहां भी कोई रिपोल नहीं। ऐसा लगता है कि दक्षिण से उत्तर तक, लोकतंत्र अब एक ऐसी मेलोडी बन गया है जिसमें विरोध के सुरों के लिए कोई जगह ही नहीं बची है।

इसी बात पर नई फिल्म भेड़िया का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था अमिताभ भट्टाचार्य ने औऱ संगीत में ढाला है सचिन- जिगर ने। इसे अरिजीत सिंह और अभिताभ भट्टाचार्य ने अपना स्वर दिया है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

तू मेरा कोई ना होके भी कुछ लागे

तू मेरा कोई ना होके भी कुछ लागे

किया रे जो भी तूने, कैसे किया रे

जिया को मेरे बांध लिया रे

अपना बना ले पिया, अपना बना ले पिया

अपना बना ले मुझे, अपना बना ले पिया

अपना बना ले पिया, अपना बना ले पिया

दिल के नगर में शहर तू बसा ले पिया

छूने से तेरे, हाँ तेरे, हाँ तेरे

फीकी रुतों को रंग लगे

तेरी गली में मुड़ें जब कदम मेरे

दुनिया नई सी लगने लगे

बीते कल का हर पन्ना

खाली है जो भर दे ना

तेरा मेरा रिश्ता ये

अनजानी इक कर दे ना

अपना बना ले पिया, अपना बना ले पिया

अपना बना ले मुझे, अपना बना ले पिया

अपना बना ले पिया, अपना बना ले पिया

दिल के नगर में शहर तू बसा ले पिया

सफर का ही था मैं, सफर का रहा

सफर का ही होकर, मैं रह जाऊं क्या?

मेरा ठिकाना तेरे पास है

तेरी इबादत मेरा एहसास है…

तू मेरा कोई ना होके भी कुछ लागे

तू मेरा कोई ना होके भी कुछ लागे…

लेकिन इस पूरी संगीत सभा का सबसे मुख्य आकर्षण रहा आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में शामिल होना। यह किसी रूहानी प्रेम-कथा से कम नहीं है। कल तक जो सांसद इंकलाब और स्वराज की कव्वालियाँ गा रहे थे, आज वे अचानक कमल के फूल को देखकर अपना बना ले पिया गुनगुनाने लगे हैं।

अशोक मित्तल जी का उदाहरण ही ले लीजिए। बेचारे 10 दिन पहले तक ईडी की छापेमारी से परेशान थे। राज्यसभा में अभी-अभी राघव चड्ढा की जगह उप-नेता बनाए गए थे। आखिर अपना बना ले मुझे, अपना बना ले पिया की पुकार में जो शक्ति है, वह किसी धरने में कहाँ! जब एक साथ सात सांसद पाला बदलते हैं, तो उसे दलबदल नहीं, बल्कि सामूहिक हृदय परिवर्तन कहा जाना चाहिए।

विपक्ष चिल्लाता रह जाता है कि यह वॉशिंग मशीन का कमाल है, पर सांसद जी मुस्कुराकर कहते हैं—सफर का ही था मैं, सफर का रहा… अब मेरा ठिकाना तेरे पास है। राजनीति के इस भेड़िया-बाजार में अब न कोई किसी का होके भी कुछ लागे है, न ही कोई पराया है। यहाँ तो बस एक ही सत्य है—जिसके पास सत्ता है, वही सबका पिया है और बाकी सब लाइन लगाकर खड़े हैं, हाथ में फूल लिए और होठों पर वही गाना—अपना बना ले पिया! इसलिए भइया मैंगो मैन समझ लें कि अपना बना ले के बोल में दरअसल क्या मर्म छिपा हुआ है।