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तेल कंपनियों को डॉलर के बजाय वैकल्पिक मुद्राओं में व्यापार के निर्देश

वैश्विक दबाव के बीच आरबीआई का बड़ा कदम

राष्ट्रीय खबर

मुंबई: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसला लिया है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने घरेलू तेल शोधन और विपणন कंपनियों को तेल आयात के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और व्यापार के लिए वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग करने का अनौपचारिक निर्देश जारी किया है।

आरबीआई का यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने और डॉलर की बढ़ती मांग को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। बैंक ने सुझाव दिया है कि तेल कंपनियां संयुक्त अरब अमीरात के साथ दिरहम, रूस के साथ रूबल या अन्य मित्र देशों के साथ भारतीय रुपये में भुगतान की संभावनाएं तलाशें।

विशेषज्ञों का मानना है कि तेल आयात भारत के कुल आयात बिल का सबसे बड़ा हिस्सा है। यदि इसका भुगतान डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं या रुपये में किया जाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की विनिमय दर को स्थिर करने में मदद मिलेगी और डॉलर की तरलता पर दबाव कम होगा।

ईरान-इजराइल संघर्ष और लाल सागर में उपजे संकट के कारण समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है, जिससे बीमा और शिपिंग लागत बढ़ गई है। ऐसे में आरबीआई चाहता है कि तेल कंपनियां भुगतान के लिए ऐसे तंत्र का उपयोग करें जो पश्चिमी प्रतिबंधों या डॉलर-आधारित प्रणालियों पर कम निर्भर हों। विशेष रूप से, खाड़ी देशों के साथ हुए हालिया समझौतों के बाद भारत अब कुछ मात्रा में कच्चे तेल की खरीद रुपये और दिरहम में कर रहा है। आरबीआई चाहता है कि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए। तेल कंपनियों को भेजे गए इस संदेश में कहा गया है कि वे अपने अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ बातचीत कर भुगतान की शर्तों को संशोधित करें।

यह बदलाव पूरी तरह से चुनौतियों रहित नहीं है। तेल बाजार में डॉलर एक वैश्विक मुद्रा है और अधिकांश निर्यातक अभी भी डॉलर में ही भुगतान स्वीकार करना पसंद करते हैं। इसके अलावा, विदेशी बैंकों में वोस्ट्रो खाते के संचालन और विनिमय दर की गणना जैसी तकनीकी जटिलताएं भी बनी हुई हैं। बावजूद इसके, आरबीआई का यह कदम भारत की ‘आर्थिक संप्रभुता’ की दिशा में एक बड़ा संकेत है। यह न केवल घरेलू मुद्रा को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की सौदेबाजी की शक्ति को भी बढ़ाएगा।