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तुर्की की खुफिया एजेंसी का भारत में बढ़ता हस्तक्षेप

भारत सरकार तक पहुंची है इन गड़बड़ियों की जानकारी

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: हाल ही में उजागर हुए गोपनीय दस्तावेजों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि तुर्की की विदेशी खुफिया गतिविधियों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें भारत एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है। इन दस्तावेजों के अनुसार, तुर्की के एजेंट नोएडा स्थित एक नागरिक समाज संगठन की निगरानी कर रहे हैं, जो विदेशी जासूसी और प्रभाव संचालन के एक व्यापक पैटर्न की ओर इशारा करता है। इस विवाद के केंद्र में इंडियालॉग फाउंडेशन नामक संस्था है। वर्ष 2005 में स्थापित इस संस्था का उद्देश्य अंतर-सांस्कृतिक समझ, अंतर-धार्मिक संवाद और सामुदायिक जुड़ाव को बढ़ावा देना है।

दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि इस फाउंडेशन की गतिविधियां और इससे जुड़े व्यक्ति तुर्की सरकार की व्यवस्थित निगरानी में थे। इस संगठन को ट्रांसनेशनल हिजमत आंदोलन से जुड़ा माना जाता है, जो दिवंगत इस्लामी विद्वान फेतुल्लाह गुलेन से प्रेरित है। गुलेन लंबे समय तक राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान के आलोचक रहे थे। दोनों गुटों के बीच राजनीतिक दरार के बाद, अंकारा ने इस आंदोलन से संबद्ध संस्थानों के खिलाफ एक आक्रामक वैश्विक अभियान छेड़ रखा है।

दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह निगरानी कितनी गहरी है, एक दस्तावेज, जो दिसंबर 2025 के उत्तरार्ध का है, तुर्की पुलिस द्वारा तैयार किया गया एक खुफिया आकलन प्रतीत होता है। जनवरी 2026 की शुरुआत में इस सामग्री को अंकारा की एक आपराधिक अदालत में भेजा गया था। यह दर्शाता है कि कैसे तुर्की विदेशी धरती पर एकत्रित खुफिया जानकारी का उपयोग अपने घरेलू कानूनी मामलों में कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की के विदेश मंत्रालय के तहत एक विशेष इकाई इसमें शामिल है। तुर्की के पूर्व खुफिया प्रमुख और वर्तमान विदेश मंत्री हाकान फिदान के कार्यकाल में खुफिया कर्मियों को विदेशी राजनयिक मिशनों (दूतावासों) में एकीकृत करने की प्रक्रिया तेज हुई है। भारत का इस सूची में शामिल होना अंकारा की बदलती भू-राजनीतिक सोच को दर्शाता है। हाल के वर्षों में तुर्की ने पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को काफी गहरा किया है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तुर्की अक्सर नई दिल्ली की नीतियों की आलोचना करता रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि इन खुफिया गतिविधियों का उद्देश्य केवल विरोधियों की निगरानी करना नहीं है, बल्कि भारत के भीतर प्रभाव और दबाव बनाने वाले नेटवर्क का निर्माण करना भी हो सकता है। नोएडा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में तुर्की की सक्रियता भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है।