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Ghazipur Rape Case Update: गाजीपुर में सिस्टम की संवेदनहीनता, 6 साल की रेप पीड़िता 15 घंटे तक इलाज को तरसी, CMO और मेडिकल कॉलेज में छिड़ा विवाद

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में नवरात्रि की अष्टमी के पावन पर्व पर एक ऐसी घटना सामने आई जिसने मानवता और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक ओर 6 साल की मासूम दरिंदगी का शिकार हुई, वहीं दूसरी ओर जिले का स्वास्थ्य महकमा इलाज और मेडिको-लीगल (MLC) के नाम पर उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल पेंडुलम की तरह दौड़ाता रहा. अब इस केस में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद मिश्रा ने प्रेस वार्ता कर अपनी स्थिति स्पष्ट की.

दरअसल, नवरात्रि की अष्टमी के दिन मासूम के साथ हुई हैवानियत के बाद परिजन उसे लेकर अस्पताल पहुंचे. आरोप है कि मासूम को इलाज देने के बजाय डॉक्टर और प्रशासन रोस्टर और नियमों की दुहाई देते रहे. करीब 8 से 9 घंटे तक जब कोई सुनवाई नहीं हुई और मासूम दर्द से तड़पती रही, तब परिजनों का सब्र टूट गया. आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल परिसर में ही धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया.

CMO बनाम मेडिकल कॉलेज

मामले के तूल पकड़ने पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. सुनील पांडे मौके पर पहुंचे. उन्होंने मेडिकल कॉलेज प्रशासन की अव्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि वो इस लापरवाही के खिलाफ शासन को पत्र लिखेंगे. जवाब में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद मिश्रा ने बयान दिया, जिसने मामले में नया मोड़ दे दिया है.

‘गायब थे ड्यूटी डॉक्टर’

प्रिंसिपल ने बताया कि मेडिको-लीगल के लिए ट्रामा सेंटर में दो राजपत्रित डॉक्टरों (डॉ. पल्लई राय और डॉ. मनोरम यादव) की रोस्टर के अनुसार ड्यूटी लगाई गई थी. लेकिन घटना के समय दोनों ही डॉक्टर मौके से नदारद थे. प्रिंसिपल के अनुसार, मासूम को पहले स्टेबल किया गया था, लेकिन डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण मेडिकल घटना के लगभग 15 घंटे बाद (दोपहर 3 बजे) हो सका. डॉ. मिश्रा ने स्पष्ट किया कि मेडिको-लीगल करने वाले राजपत्रित अधिकारी सीधे CMO के नियंत्रण में आते हैं, ऐसे में उनकी अनुपस्थिति का जवाबदेही भी उन्हीं की है.

सिस्टम की संवेदनहीनता पर सवाल

हैरानी की बात यह है कि जब जिले के आला अधिकारी एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं, उस वक्त एक 6 साल की मासूम न्याय और इलाज की आस में सिसकती रही. मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ट्रामा सेंटर के संचालन के बाद से ही मेडिको-लीगल की जिम्मेदारी वहां तय की गई है, फिर भी ऐसी लापरवाही होना गंभीर जांच का विषय है.

फिलहाल, इस मामले ने शासन तक दस्तक दे दी है. मासूम के परिजनों की मांग है कि न सिर्फ अपराधी को कड़ी सजा मिले, बल्कि उन डॉक्टरों पर भी कार्रवाई हो जिन्होंने संकट की घड़ी में अपनी ड्यूटी से मुंह मोड़ लिया.