दुनिया के रंगमंच पर इन दिनों प्रहसन (कॉमेडी) और त्रासदी (ट्रेजेडी) का ऐसा घालमेल हुआ है कि शेक्सपियर भी जीवित होते तो अपना सिर खुजलाने लगते। राजनीति अब नीति से नहीं, बल्कि अतिशयोक्ति और विस्मृति के इंधन से चल रही है।
शुरुआत करते हैं सुदूर पश्चिम से, जहाँ के बेताज बादशाह डोनाल्ड ट्रंप ने एक और ऐसा शिगूफा छोड़ा है, जिसने वैश्विक कूटनीति के होश उड़ा दिए हैं। ट्रंप साहब का दावा है कि ईरान—जी हाँ, वही ईरान जो अमेरिका को बड़ा शैतान कहता है—उन्हें अपना सुप्रीम कमांडर बनाना चाहता था। ट्रंप ने बड़ी विनम्रता (जो उनमें कूट-कूट कर भरी है) से इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
अब कल्पना कीजिए, तेहरान की गलियों में अयातुल्ला खामेनेई और ट्रंप साथ बैठकर बर्गर खा रहे हैं और ट्रंप परमाणु डील पर हाथ साफ कर रहे हैं! यह दावा वैसा ही है जैसे कोई कहे कि शेर ने घास खाने का मन बनाया था, लेकिन घास ने ही इनकार कर दिया। ट्रंप का यह सुप्रीम आत्मविश्वास बताता है कि राजनीति में झूठ इतना बड़ा होना चाहिए कि सुनने वाला तर्क करना ही भूल जाए।
इधर, हमारे अपने प्रधान सेवक ने भी सरहदों की परिभाषाएं बदल दी हैं। इजरायल की धरती पर जाकर उन्होंने उसे अपना फादरलैंड कह दिया। कूटनीति के गलियारों में अब लोग नक्शे लेकर बैठे हैं कि अगर इजरायल फादरलैंड है, तो फिर भारत क्या है? क्या अब राष्ट्रवाद की नई परिभाषा में वतन सिर्फ वही है जहाँ तकनीक और हथियार मिलते हों?
भावनाओं के इस अतिरेक में शायद हम यह भूल गए कि भारत माता का नारा लगाने वाले देश में अचानक पितृसत्तात्मक अंतरराष्ट्रीयवाद कहाँ से आ गया। खैर, साहब की मोहब्बत ही ऐसी है कि जहाँ जाते हैं, वहीं के हो जाते हैं—कम से कम भाषण समाप्त होने तक।
इसी बात पर 1967 में बनी फिल्म उपकार का वह गीत याद आता है, जिसे इंदीवर ने लिखा था और कल्याण जी आनंद जी ने संगीत में ढाला था। मन्ना डे ने इसे स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं।
कस्मे वादे प्यार वफा सब, बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं ये दुनिया, नाते हैं नातों का क्या
कस्मे वादे प्यार वफा सब…
होगा मसीहा सामने तेरे, फिर भी न तू बच पायेगा
तेरा अपना खून ही आखिर, तुझको जहर पिलायेगा
जनम मरण का साथ है जिनका, वो भी साथ छुड़ायेंगे
कस्मे वादे प्यार वफा सब…
तनु की खूबसूरती और जवानी, ये तो बस दो दिन का खेल है
प्यार का दावा करने वाले, मतलब के सब मेल हैं
देखेंगे जब वक्त पड़ेगा, सब मुखड़ा मोड़ जायेंगे
कस्मे वादे प्यार वफा सब…
हंस के किसी ने बात कही तो, तूने उसे सच मान लिया
पत्थर के इन इंसानों को, तूने अपना जान लिया
एक दिन तेरी आँखें खुलेंगी, सपने सब टूट जायेंगे
कस्मे वादे प्यार वफा सब…
लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से उतरकर जब हम अपनी गलियों में आते हैं, तो मंजर थोड़ा अलग है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी साहब बड़े इत्मीनान से टीवी कैमरों पर कह रहे हैं कि देश में ऊर्जा का कोई संकट नहीं है। वे आंकड़े पेश कर रहे हैं, ग्राफ दिखा रहे हैं और विश्वास दिला रहे हैं कि सब चंगा है। जनता को समझ नहीं आ रहा कि वे मंत्री जी के दावों पर यकीन करें या अपनी खाली टंकियों पर।
यह रिफिल और रिलीफ के बीच का वह अंतर है, जिसे केवल एक आम आदमी ही महसूस कर सकता है। सरकारी शब्दकोश में शायद संकट की परिभाषा बदल गई है—जब तक कि मंत्री जी की अपनी गाड़ी न रुक जाए, तब तक संकट कैसा?
और इन सबके बीच, लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर के द्वारपाल, यानी चुनाव आयोग से एक ऐसी चूक हुई है जो कॉमेडी ऑफ एरर्स की पराकाष्ठा है। आयोग के पत्र पर केरल भाजपा की मुहर लगी पाई गई। अब इसे आप तकनीकी गलती कहेंगे, टाइपिंग एरर कहेंगे या दिल का हाल जुबां पर आना कहेंगे?
उनके कार्यालय में भाजपा की मुहर कैसे आयी, यह सवाल मत पूछियेगा। बस समझ लेना चाहिए कि निष्पक्षता ने अब किसी कार्यालय विशेष में शरण ले ली है। चुनाव आयोग का यह भाजपा प्रेम अब कागजों पर भी छलकने लगा है। शायद भविष्य में हमें ऐसे पत्र मिलें जहाँ आधिकारिक सील की जगह पार्टी का चुनाव चिन्ह ही छपा हो, क्योंकि अब शर्म और मर्यादा के पर्दे काफी झीने हो चुके हैं। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि ट्रंप को विदेशों में पद मिल रहे हैं, हमारे अपनों को विदेशों में पुरखे मिल रहे हैं, मंत्रियों को संकट में समाधान दिख रहा है और संस्थाओं को अपनी पहचान खोने में ही अपनी भलाई दिख रही है। यह एक ऐसा सर्कस है जहाँ जोकर गंभीर हैं और दर्शक रो रहे हैं।