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13 साल का दर्द और ‘इच्छामृत्यु’ की जंग खत्म! दिल्ली AIIMS में हरीश राणा ने ली अंतिम सांस; कोमा में रहते हुए दुनिया को कह गए अलविदा

सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मंजूरी पाने वाले हरीश राणा ने दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली है. पैसिव यूथेनेसिया के प्रोसीजर के तहत उनका निधन हुआ है. कुछ दिन पहले ही उनका पोषण को धीरे- धीरे बंद किया गया था. जिसके बाद उनका निधन हो गया. पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से इसकी पुष्टि की है.

हरीश राणा करीब 13 साल से कोमा की बीमारी से जूझ रहे थे और उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी. इलाज के बावजूद जब सुधार की संभावना कम हो गई और आर्थिक बोझ बढ़ने लगा, तब उनके माता- पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने उन्हें इच्छामृत्यु की मंजूरी दी. यह भारत में इस तरह का पहला मामला है.

भारत में यह प्रक्रिया सख्त कानूनी और मेडिकल गाइडलाइंस के तहत ही संभव है. इसी कारण हरीश को एम्स में लाया गया था. वह यहां पैलिएटिव केयर विभाग में कई डॉक्टरों की निगरानी में थे. पहले उनका पोषण बंद किया गया और इसके बाद धीरे धीरे दूसरे प्रोसीजर किए गए. इसके बाद अब हरीश ने अपना शरीर त्याग दिया है.

13 साल से कोमा में थे

हरीश राणा 13 साल से कोमा में थे. छत से गिरने के एक हादसे के बाद उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी. इसके बाद वह कोमा में चले गए थे. उनके माता- पिता ने देश के बड़े- बड़े अस्पतालों में उनका इलाज कराया, लेकिन हरीश कोमा से बाहर नहीं आ सके. सभी बड़े डॉक्टरों ने हरीश के ठीक होने की संभावना को भी खारिज कर दिया था. हालांकि 13 साल से उनका इलाज चल रहा था. हरीश के इलाज का हर महीने करीब 60 से 70 हजार का खर्च था. परिवार अब आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो गया था. जब हरीश के ठीक होने की उम्मीद खत्म हो गई तो ऐसे में परिजन कोर्ट गए थे. जहां इच्छामृत्यु की मंजूरी मिली थी.

क्या होती है इच्छामृत्यु

इच्छामृत्यु का मतलब है कि ऐसी स्थिति में जिसमें इलाज को सीमित या बंद करना होता है. ऐसे तब होता है जब मरीज के ठीक होने की संभावना बेहद कम हो और वह असहनीय पीड़ा में हो. भारत में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत कुछ शर्तों के साथ ऐसा किया जाता है. मरीज का पोषण धीरे- धीरे बंद किया जाता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उसको किसी तरह का दर्द न हो. इसके लिए दवाएं चलाई जाती हैं.