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तेलंगाना से खदेड़े गए, बस्तर में ‘राज’ किया! आखिर कैसे छत्तीसगढ़ का ये जिला बन गया माओवादियों का हेडक्वार्टर? इनसाइड स्टोरी

जगदलपुर। आंध्र प्रदेश में सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ने के साथ 1980 के दशक में माओवादियों ने बस्तर को एक वैकल्पिक ‘बेस एरिया’ के रूप में चुना। यह एक सुरक्षित क्षेत्र था, जहां से पूरे आंदोलन का संचालन किया जा सके। यही रणनीतिक परिवर्तन बस्तर को देश के सबसे शक्तिशाली माओवादी केंद्र में बदलने का कारण बना।

इसकी पृष्ठभूमि 1969 के आस-पास बननी शुरू हुई, जब बस्तर के गांवों में “जमीन आपकी, जंगल आपका फिर हक किसका?” जैसे सवाल उठने लगे। भोपालपटनम क्षेत्र में डाक्टर आइएस मूर्ति जैसे लोग इलाज के साथ-साथ अधिकारों की बात भी गांव-गांव तक पहुंचा रहे थे। उनकी गिरफ्तारी बस्तर में दर्ज पहली महत्वपूर्ण घटना थी।

कोंडापल्ली के नेतृत्व में बस्तर में विस्तार का शुरू हुआ काम

1974 में पोलमपल्ली में हुई तीन डकैती की घटनाओं ने यह संकेत दिया कि यह आंदोलन अब वैचारिक दायरे से निकलकर सशस्त्र दिशा में बढ़ रहा है। 1980 के दशक में कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में भाकपा पीपुल्स वार ग्रुप ने दंडकारण्य, विशेषकर बस्तर को योजनाबद्ध तरीके से विकसित करना शुरू किया।

इसका उद्देश्य तेलंगाना-आंध्र क्षेत्र में चल रहे आंदोलन के लिए एक वैकल्पिक, सुरक्षित और दीर्घकालिक संचालन केंद्र तैयार करना था। माओ त्से तुंग के ‘प्रोलोंग्ड पीपुल्स वार’ सिद्धांत के तहत यहां जंगल को सुरक्षा कवच और स्थानीय समाज को आधार बनाया गया।

जनताना सरकार से जनयुद्ध का केंद्र बना बस्तर

1990 के दशक के बाद बस्तर में माओवादी रणनीति ने नया रूप लिया, जिसमें समानांतर सत्ता खड़ी करने की कोशिश की गई। गांव-गांव में ‘जनताना सरकार’ के नाम पर ऐसी व्यवस्था बनाई गई, जिसमें न्याय से जुड़े फैसले संगठन लेने लगा। धीरे-धीरे राज्य की उपस्थिति सीमित होती गई और बस्तर माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ बनता चला गया।

1992 में केशकाल के पास बॉक्साइड खदान के विरोध के दौरान ट्रक में आगजनी की घटना ने यह संकेत दिया कि आंदोलन अब खुलकर टकराव की राह पर है। इसके बाद लोस चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या वाले दिन छोटेडोंगर थाना क्षेत्र में चुनावी ड्यूटी पर जा रही टीम पर बारूदी सुरंग से हमला किया गया।

भाकपा (माओवादी) के गठन के एक वर्ष बाद, 2005 में माओवादियों ने पहली बार माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल (एमपीवी) को निशाना बनाया। बारूदी सुरंग के इस हमले ने सुरक्षा बलों के सामने विस्फोटक खतरे की गंभीरता को नई तरह से उजागर कर दिया।

1980 के दशक की शुरुआत में रणनीति दो स्तरों पर लागू हुई

मडगू सम्बैया (सुरन्ना), जनार्दन (वीरन्ना) और गोलकोंडा रामचंद्र (राजन्ना) जैसे नेताओं ने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया। 1990 के दशक तक बस्तर में पार्टी सेल, संगम और दलम का संगठित ढांचा तैयार हो चुका था। 1992 में मल्लाजी रेड्डी को डिस्ट्रिक्ट कमेटी का सचिव और नंबाला केशव राव उर्फ बसव राजू को फारेस्ट कमेटी का सचिव चुना गया।