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अफीम की जगह अब स्ट्रॉबेरी की खुशबू! पलामू के मनातू में हुआ बड़ा ‘खेला’, मुख्यधारा में लौट रहे ग्रामीणों ने बदल दी इलाके की किस्मत

पलामू: जिस जमीन पर कभी अफीम की खेती होती थी, अब वहां स्ट्रॉबेरी की मिठास उग रही है. इतना ही नहीं, इसी जमीन पर कई पारंपरिक फसलें भी उगाई जा रही हैं. यह बदलाव हुआ है- पलामू के मनातू इलाके में.

दरअसल, पलामू जिला प्रशासन और पुलिस ने अफीम की खेती से प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए कई योजनाओं पर काम शुरू किया था. इस पहल के तहत किसानों को खेती के अलग-अलग पहलुओं पर जानकारी और मार्गदर्शन दिया गया. पलामू पुलिस और जिला प्रशासन की मिली-जुली पहल के बाद, पहले अफीम की खेती करने वाले लोगों ने मधु उत्पादन शुरू किया. इसके बाद, स्थानीय ग्रामीणों ने सरसों और चना जैसी फसलें उगाना शुरू कर दिया.

अब, किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू कर दी है और जल्द ही इस इलाके में मछली पालन भी शुरू होने वाला है. मनातू इलाका आजकल स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मशहूर हो गया है, और कई इलाकों में स्थानीय गांव वाले इस खेती को अपना रहे हैं.

इलाके को स्ट्रॉबेरी हब बनाने की योजना

मनातू के तिलो, मुरधवई, मिटार, नागद, गोरवा, जसपुर, दलदलिया और बेटापथल जैसे इलाके पहले से अफीम की खेती के लिए जाने जाते रहे हैं. अब इसी इलाके को स्ट्रॉबेरी प्रोडक्शन का हब बनाने का प्लान है. शुरुआती दौर में, 10 किसान इस खेती के काम से जुड़े हैं.

राधेश्याम नाम के किसान ने सबसे पहले यह खेती शुरू की, उन्होंने दो एकड़ जमीन पर स्ट्रॉबेरी लगाई. उनकी सफलता से प्रेरित होकर, तिलो गांव के जितेंद्र कुमार यादव, मनोज साव, अनूप कुमार मेहता और राजेंद्र महतो समेत 10 और लोगों ने भी स्ट्रॉबेरी उगाना शुरू कर दिया है.

इन 10 लोगों के जरिए, पूरे इलाके में एक चेन तैयार किया जाएगा और पूरे इलाके में स्ट्रॉबेरी की खेती करायी जाएगी. जेएसएलपीएस की ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर (बीपीएम) कुमारी नम्रता ने बताया कि अभी 10 गांववाले इसमें शामिल हैं, लेकिन मकसद पूरे मनातू इलाके में स्ट्रॉबेरी की खेती को बढ़ाना है, खासकर उन इलाकों को टारगेट करना जहां पहले से अफीम की खेती होती रही है.

मनातू इलाके की पहचान बदलना चाहते हैं ग्रामीण

मनातू के ग्रामीण अपने इलाके की पहचान बदलना चाहते हैं. नक्सली हिंसा के बाद, यह इलाका अफीम की खेती के लिए पूरे देश में बदनाम हो गया था. नक्सलियों के कमजोर होने के बाद, अफीम की खेती बड़े पैमाने पर शुरू हो गई थी. हालांकि, 2025 में एक साथ चलाए गए अभियान के बाद, खेती के आंकड़ों में कमी आई है.

स्थानीय ग्रामीण कहते हैं कि वे मनातू की पहचान को बदलते हुए देखना चाहते हैं. चाहे वह स्ट्रॉबेरी की खेती हो या इलाके की दूसरी तरह की खेती, गांववालों का मानना ​​है कि इसे पूरा करने के लिए उन्हें एकजुट होना होगा. मनातू की रहने वाली पूनम देवी ने खुशी जताई कि उनके इलाके में अब स्ट्रॉबेरी की खेती और मधुमक्खी पालन की कोशिशें शुरू हो रही हैं. इलाके की पहचान बदलनी चाहिए, यह इलाका नक्सलवाद और अफीम के कारण चर्चित रहा है. उन्होंने कहा कि इस कोशिश में ग्रामीण एकजुट हैं.

मनातू इलाके के लिए तैयार की गई खास योजना

सरकार ने मनातू इलाके में बदलाव लाने के मकसद से कई योजनाएं शुरू की हैं. पलामू पुलिस और झारखंड लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी गांववालों को खेती के कामों में सक्रिय रूप से मदद कर रही हैं. पलामू पुलिस ने, खास तौर पर, इलाके के हर गांव का दौरा किया ताकि सर्वे किया जा सके और वहां रहने वालों की पूरी लिस्ट बनाई जा सके.

इस सर्वे के दौरान, ग्रामीण किस तरह की फसलें उगाना पसंद करते हैं, इस बारे में जानकारी इकट्ठा की गई और उन्हें खेती के सही तरीकों के बारे में भी बताया गया. इसके अलावा, झारखंड लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के माध्यम से अफीम की खेती छोड़ने वाले लोगों को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए सहायता उपलब्ध कराई जा रही है.

“अफीम की खेती करना या इसका कारोबार करना भी एक दंडनीय अपराध है. पिछले साल ही, मनातू में 16 FIR दर्ज की गईं, जिसमें 200 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया है. पुलिस की कार्रवाई और अलग-अलग जागरूकता अभियान का असर हुआ और लोग पारंपरिक खेती पर शिफ्ट हुए. लोग सूचनाएं भी दे रहे हैं. यह एक अच्छी बात है कि लोग अब स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं, इससे पहले लोगों ने मधुमक्खी पालन भी किया. जो लोग अफीम की खेती छोड़ रहे हैं, उनका स्वागत है, पुलिस उनकी मांग के हिसाब से मदद कर रही है, और अन्य विभागों के साथ मिलकर उन्हें खेती के संसाधन देने का इंतजाम किया जा रहा है. मनातू में ट्रेनिंग प्रोग्राम का भी आयोजन किया गया, जहां लोगों को जानकारी दी गई.” – रीष्मा रमेशन, एसपी