पीली दाल आयात नीति पर विचार करे केंद्र
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार को पीली मटर और दालों की आयात नीति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार से आग्रह किया है कि वह संबंधित हितधारकों के साथ बैठक बुलाकर मौजूदा नीतिगत ढांचे की समीक्षा करे।
अदालत का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि देश को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों को गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों के बजाय दालों की खेती की ओर आकर्षित करने के लिए उचित प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह महसूस किया कि कृषि और वाणिज्य जैसे विभिन्न मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता है।
कोर्ट ने गौर किया कि भारी मात्रा में दालों का आयात करने से घरेलू बाजार में कीमतें गिरती हैं, जिससे स्थानीय किसानों का मनोबल टूटता है। न्यायमूर्ति की पीठ ने सुझाव दिया कि किसानों को गेहूं और धान के चक्र से बाहर निकालने के लिए दालों पर बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य और अन्य वित्तीय लाभ देने की नीति तैयार की जानी चाहिए।
अदालत ने दालों की खेती को बढ़ावा देने के पीछे कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और आर्थिक तर्क दिए। दालें भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है। गेहूं और धान की तुलना में दालों की खेती में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है, जो गिरते भू-जल स्तर को देखते हुए भारत के लिए अनिवार्य है। भारी आयात बिल को कम करने और विदेशी मुद्रा की बचत करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना रणनीतिक रूप से आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा कि आयात नीतियां ऐसी न हों जो भारतीय किसानों के हितों को नुकसान पहुँचाएँ। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक व्यापक नीति की आवश्यकता है जो उपभोक्ताओं के लिए सस्ती दालों की उपलब्धता और किसानों के लिए लाभकारी मूल्य के बीच संतुलन बनाए रखे। सरकार को अब विभिन्न कृषि संगठनों और आयात-निर्यात विशेषज्ञों के साथ चर्चा कर एक नई कार्ययोजना प्रस्तुत करनी होगी। यह आदेश भारत के कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक सुधारों और सतत विकास की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को भी गति दे सकता है।