तेल का खेल, जनता लाइन में सरकार फेल
यह अक्सर तर्क दिया जाता है कि डेटा नया तेल है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कच्चे तेल ने अपनी भू-राजनीतिक अहमियत खो दी है। पश्चिम एशिया में जारी वर्तमान सैन्य टकराव, जहाँ ईरान को इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा घेरा जा रहा है, इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि दुनिया आज भी तेल पर ही चल रही है—और संकट के समय इसी तेल पर फिसल भी रही है। दरअसल मुंह से कोई कितना भी भाषण देता रहे पर उसे भी अपना पेट भरने के लिए रोटी ही चाहिए जो इस डेटा से कतई पैदा नहीं हो सकता।
उसके लिए अनाज चाहिए और अनाज उत्पादन के लिए भी तेल चाहिए चाहे वह खेत के पंप का डीजल अथवा रसोई गैस क्यों ना हो। वर्तमान में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और आपूर्ति श्रृंखला में गंभीर बाधाएं उत्पन्न हुई हैं। भारत में, केंद्र सरकार को आपातकालीन उपायों का सहारा लेना पड़ा है ताकि विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इन संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। अमेरिका में तेल और गैस की कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं, जबकि यूरोप में गैस की बढ़ती कीमतों ने आम जनजीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। यह स्थिति तब और भी दिलचस्प हो जाती है जब हम अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों पर नजर डालते हैं।
आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में तेल की हिस्सेदारी अब उतनी नहीं रही जितनी पहले थी; यह अब 30 फीसद से भी कम है। वर्तमान में वैश्विक ऊर्जा व्यय का दो-तिहाई हिस्सा सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों की ओर निर्देशित है। लेकिन वास्तविकता की बारीक परतें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।
आज दुनिया 1970 के दशक की तुलना में कहीं अधिक तेल की खपत कर रही है, और प्राकृतिक गैस का उपयोग पहले से कहीं अधिक व्यापक घरेलू और औद्योगिक ग्रिडों में हो रहा है। पश्चिम एशिया संकट ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह जलडमरूमध्य दुनिया की तेल और गैस आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। इसकी घेराबंदी ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वास्तव में तेल के युग से बाहर निकल पाए हैं?
अक्सर यह अटकलें लगाई जाती हैं कि तेल का यह संकट स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण को गति दे सकता है। एक ऐसी तेल-मुक्त भविष्य की कल्पना की जाती है जहाँ विकल्प तेल को उसके सिंहासन से उतार देंगे। लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि वह दौर अभी दूर है। इसके अलावा, एक और प्रासंगिक प्रश्न यह है: क्या स्वच्छ ऊर्जा वाला भविष्य उन असमानताओं से मुक्त होगा जो आज की भू-राजनीति को प्रभावित करती हैं? यदि भविष्य में सौर पैनलों के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों पर कुछ ही देशों का कब्जा रहा, तो संसाधन की असमानता का पुराना खेल नए चेहरे के साथ फिर से शुरू हो जाएगा।
तेल का भू-रणनीतिक आकर्षण इसे एक दोधारी तलवार बनाता है। इसकी बहुमूल्य स्थिति अक्सर बड़े संघर्षों का कारण बनती है। उदाहरण के तौर पर, वेनेजुएला में अमेरिका का सैन्य हस्तक्षेप कई आलोचकों की नजर में वहां के विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण पाने की लालसा से प्रेरित था। पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष में भी तेल और ऊर्जा प्रतिष्ठान इस युद्ध के कोलैटरल डैमेज (पार्श्व क्षति) बन गए हैं, जहाँ प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे के प्रमुख गैस और तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं।
हालांकि, इस संकट का एक सकारात्मक पहलू भी है। तेल की वैश्विक प्रासंगिकता इतनी अधिक है कि इसके कारण पैदा होने वाला गहरा आर्थिक संकट वास्तव में सैन्य टकराव को कम करने का जरिया बन सकता है। कोई भी बड़ी शक्ति—चाहे वह अमेरिका हो, चीन हो या रूस—वैश्विक अर्थव्यवस्था के पूरी तरह चरमराने का जोखिम नहीं उठा सकती।
जब तेल की कमी दुनिया को अंधेरे की ओर धकेलने लगती है, तब अक्सर कूटनीति के बंद दरवाजे खुलते हैं। अंततः, तेल आज भी वैश्विक राजनीति का वह धुरा है जिसके चारों ओर अर्थव्यवस्थाएं और युद्ध घूमते हैं। जब तक स्वच्छ ऊर्जा पूर्ण रूप से तेल का विकल्प नहीं बन जाती, तब तक पश्चिम एशिया की हर हलचल दुनिया की रसोई से लेकर उसकी सीमाओं तक महसूस की जाती रहेगी। अब इसी तेल के खेल में कौन कब और कैसे फिसल जाएगा, यह कह पाना कठिन है पर यह साफ होने लगा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो स्वयंभू शांति कर्ता बने हुए हैं, हालात देखकर फिर किसी बहाने से अचानक यू टर्न ले सकते हैं। दरअसल अमेरिका को भी समय पर दो वक्त की रोटी चाहिए, जो तेल की उपलब्धता से ही सुनिश्चित हो सकती है।