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हिजबुल्ला की गतिविधियों को रोक पाने में विफल लेबनान

ईरान-इजरायल युद्ध की आग में विस्थापन का संकट

बेरूतः सीएनएन की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध को अभी मात्र एक सप्ताह ही बीता है, लेकिन लेबनान पूरी तरह से इस भीषण संघर्ष की चपेट में आ चुका है। मध्य पूर्व में छिड़ी इस महाजंग ने लेबनान को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से वापसी का रास्ता केवल तबाही की ओर जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि लेबनान, जो पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था, अब आधिकारिक तौर पर ईरान समर्थित हिजबुल्लाह और इजरायली सेना के बीच एक मुख्य युद्धक्षेत्र बन गया है। इजरायल ने हिजबुल्लाह के ठिकानों पर अपने हवाई हमलों के अभियान को अत्यधिक तेज कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप भारी रक्तपात हो रहा है और लाखों लोग अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं।

भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि लेबनान का इस युद्ध में घसीटा जाना अपरिहार्य था, क्योंकि हिजबुल्लाह ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या के प्रतिशोध में इजरायल पर रॉकेटों और ड्रोनों की बौछार कर दी थी। इसके जवाब में इजरायली वायुसेना ने न केवल दक्षिणी लेबनान, बल्कि राजधानी बेरूत के घनी आबादी वाले इलाकों (दहियाह) और यहाँ तक कि त्रिपोली तक बमबारी की है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में ही लगभग 3,00,000 से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं। सड़कों पर कारों का रेला लगा है और लोग अपने बच्चों और चंद जरूरी सामानों के साथ सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भटक रहे हैं। कई विस्थापित परिवार स्कूलों, सार्वजनिक उद्यानों और यहाँ तक कि अपनी कारों में रातें गुजारने को विवश हैं।

मानवीय दृष्टि से स्थिति अत्यंत भयावह होती जा रही है। इजरायली सेना ने लिटानी नदी के दक्षिण के सभी क्षेत्रों को खाली करने का सख्त आदेश जारी किया है, जिससे दक्षिणी लेबनान का एक बड़ा हिस्सा लगभग जनशून्य हो गया है। सीएनएन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुसार, लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब तक सैकड़ों मौतों और हजारों घायलों की पुष्टि की है। इस युद्ध ने लेबनान की संप्रभुता को भी गंभीर संकट में डाल दिया है। लेबनानी प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने हिजबुल्लाह की गतिविधियों को गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देश की सेना और सरकार इस मिलिशिया समूह को रोकने में लाचार नजर आ रही है।

जैसे-जैसे युद्ध का दायरा बढ़ रहा है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं भी गहरी होती जा रही हैं। लेबनान में तैनात संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों पर भी हमले की खबरें आई हैं, जिससे स्थिति और अधिक पेचीदा हो गई है। यह संघर्ष अब केवल दो देशों की सीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक क्षेत्रीय मानवीय आपदा का रूप ले लिया है। अगर यह युद्ध जल्द नहीं थमता, तो लेबनान एक ऐसे मलबे के ढेर में तब्दील हो सकता है जिसे फिर से खड़ा करने में दशकों का समय लगेगा।