बेचारों को अपमान का पैग पीना पड़ रहा है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने तो मामला चालू होने के पहले ही वह फैसला सुना दिया मानो किसी रसोई की आग में एक बाल्टी पानी डाल दिया जाए। इतने दिनों से पता नहीं कितने करोड़ का शराब घोटाला बता रहे थे। अब अदालत ने कहा कि कोई सबूत ही नहीं दिखता। वइसे देश के मैंगो मैन को यह पहले से ही दिख रहा था कि भरोसे लायक कोई सबूत सामने नहीं आया है।
फिर भी जब कभी करोड़ों की बात होती तो कनफ्यूजन हो जाता था। अब बेचारो सीबीआई वाले भी भागे भागे हाईकोर्ट पहुंचे हैं ताकि निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी जा सके। अदालत ने तो जांच अधिकारी के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई का निर्देश दे रखा है। अब जांच अधिकारी ने मुंह खोल दिया तो आग कहां तक लगेगी, यह साफ दिखाई देता है।
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—एक वो जो पीते हैं, और दूसरे वो जो पीने की वजह बताते हैं। पहले वाले ईमानदार अपराधी हैं, दूसरे वाले दार्शनिक। लेखक और कवि सदियों से कह रहे हैं कि शराब सेहत के लिए हानिकारक है, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि बहाना सेहत के लिए कितना अनिवार्य है।
इसी दर्शन की आधारशिला रखी गई थी, जब एक गीत गूंजा: मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ गम भुलाने को। यह महज एक गाना नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के हर उस व्यक्ति का संविधान है, जो बोतल खोलते समय अपनी अंतरात्मा को रिश्वत देना चाहता है। दिल को बहलाने का गॉलिब ख्याल अच्छा है।
वैसे, इस लेख को पढ़ने के बाद अगर आपका मन भी कुछ भुलाने का कर रहा है, तो याद रखिएगा—समाज तो समझ ही बैठा है कि आप शराबी हैं, तो कम से कम अच्छे संगीत का आनंद ही ले लीजिए! फिल्म कुली (1983) के लिए इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने। इसे शब्बीर कुमार और अलका याग्निक ने गाया था।
मुझे पीने का शौक़ नहीं, पीता हूँ ग़म भुलाने को
तेरी यादें मिटाने को, पीता हूँ ग़म भुलाने को
मुझे पीने का शौक़ नहीं…
मुझे पीने का शौक़ नहीं, पीती हूँ ग़म भुलाने को
तेरी यादें मिटाने को, पीती हूँ ग़म भुलाने को
मुझे पीने का शौक़ नहीं…
लाखों में हज़ारों में, इक तू ना नज़र आई
तेरा कोई ख़त आया, न कोई खबर आई
क्या तूने भुला डाला, अपने इस दीवाने को
मुझे पीने का शौक़ नहीं…
खोई वो किताब-ए-दिल, जिस दिल का है ये क़िस्सा
एक हिस्सा है पास मेरे, तेरे पास है एक हिस्सा
मैं पूरा करूँ कैसे, इस दिल के फ़साने को
मुझे पीने का शौक़ नहीं…
मिल जाते अगर अब हम, आग लग जाती पानी में
बचपन सी वही दोस्ती, हो जाती जवानी में
चाहत में बदल देते, हम इस दोस्ताने को
मुझे पीने का शौक़ नहीं…
आज के दौर में तो गम का विस्तार इतना हो गया है कि आदमी को बहाना ढूँढने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। ऐसे में पीता हूँ गम भुलाने को वाली लाइन एक यूनिवर्सल इमरजेंसी एग्जिट की तरह काम करती है। व्यक्ति सोचता है कि काश! एक पैग मार लिया जाए ताकि वह म्यूट बटन दबा सके। वह पीता है ताकि वह उन नोटिफिकेशन्स के शोर को खामोश कर सके। यहाँ शराब एक एंटी-वायरस की तरह काम करती है, जो दिमाग की कैश मेमोरी को साफ करने का दावा करती है, भले ही अगले दिन हैंगओवर का सिस्टम क्रैश ही क्यों न हो जाए।
यह समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। आप लाइब्रेरी में दस घंटे बैठें, तो लोग आपको पढ़ाकू कहेंगे, लेकिन आप मयखाने में दस घंटे बैठें (भले ही आप वहां केवल मूंगफली खा रहे हों), तो लोग आपको शराबी का टैग दे देंगे। यह टैग्स की दुनिया है। और जब समाज टैग लगा देता है, तो आदमी थक-हार कर कहता है—ठीक है भाई, अगर मान ही लिया है तो फिर सबूत भी दे ही देता हूँ।
सच तो यह है कि गम अब एक मुद्रा बन गया है। जिसके पास जितना बड़ा गम, उसके पास पीने का उतना ही वैध लाइसेंस। अगर आपके पास कोई गम नहीं है, तो आप एक साधारण नशेड़ी कहलाएंगे। लेकिन अगर आपके पास एक टूटे हुए दिल की कहानी है, तो आप देवदास कहलाएंगे। और भारत में देवदास होना एक पदवी है, एक सम्मान है। लेखक ने जब ये बोल लिखे होंगे, तो शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं होगा कि वह एक ऐसा एल्बी तैयार कर रहे हैं जो पीढ़ियों तक इस्तेमाल होगा। अब अपने अपने हिसाब से घटनाओँ को पैग के साथ गटक जाइये और बेफिक्र रहिए।