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सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

आजकल की राजनीति में विचारधाराएं बिल्कुल वैसे ही बदलती हैं जैसे किसी फिल्मी गाने में अचानक रीमिक्स आ जाता है। कल तक जो नेता एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे, वे आज एक ही मंच पर बैठे मुस्कुरा रहे होते हैं। उनकी इस मुस्कुराहट को देखकर बड़े अच्छे लगते हैं वाला सुकून नहीं मिलता, बल्कि दिल से आवाज़ आती है— ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे… (जब तक अगली सीट शेयरिंग की बात न फँस जाए)।

एक तरफ इंडिया गठबंधन अपनी सुर-ताल मिलाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष अपने पुराने साथियों को वापस बुलाने के लिए आ जा रे, अब मेरा दिल पुकारा की तर्ज पर रेड कार्पेट बिछाए खड़ा है। जनता बेचारी बीच में खड़ी होकर बस यह सोच रही है कि जिसे उसने कल विलेन समझकर वोट दिया था, वह आज हीरो के साथ साइड रोल में कैसे आ गया?

2026 की राजनीति में अब भाषणों से ज्यादा रील्स और एआई का बोलबाला है। हाल ही में एआई द्वारा बनाए गए व्यंग्यात्मक वीडियो पर जो बवाल मचा, उसे देखकर तो लगता है कि नेता जी कह रहे हैं— लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में… पापा ने देख लिए, तो डंडे पड़े रात में! यहाँ डंडे का काम सरकारी नियम और तय समय सीमा वाले नोटिस कर रहे हैं।

आजकल का डिजिटल इंडिया इतना एडवांस हो गया है कि नेता जी की शक्ल पर किसी और की आवाज चिपकाकर ऐसा गाना गवाया जाता है कि ओरिजिनल गायक भी शर्मिंदा हो जाए। इस डिजिटल उथल-पुथल को देखकर जनता बस यही गाती रह जाती है— दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम सोशल मीडिया के चक्कर में अनपढ़ ही रह गए।

आज के दौर में यदि आप भारतीय राजनीति के गलियारों में टहलने निकलें, तो आपको वह मशहूर फिल्मी गाना जरूर याद आएगा— सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी। राज कपूर साहब ने जब यह गीत गाया होगा, तो शायद उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दशकों बाद यह पंक्तियां भारतीय नेताओं के लिए आधिकारिक एंथम बन जाएंगी। फर्क बस इतना है कि यहाँ अनाड़ी शब्द का अर्थ भोलापन नहीं, बल्कि वह गजब की स्मार्टनेस है जो जनता को अनाड़ी समझती है।

फिल्म अनाड़ी (1959) का यह गीत भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित और अर्थपूर्ण गीतों में से एक है। इसे शैलेंद्र ने लिखा था और शंकर जयकिशन ने सुर दिया था। इसे मुकेश कुमार ने गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

दुनिया ने कितना समझाया, कौन है अपना कौन पराया

दुनिया ने कितना समझाया, कौन है अपना कौन पराया

फिर भी दिल की चोट छुपाकर, हमने आपना आप गंवाया

मस्त हवा के झोंके खाकर, हमने अपना आप गंवाया

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

नीली छतरी वाले ने जब, ऐसी घड़ी बनायी होगी

नीली छतरी वाले ने जब, ऐसी घड़ी बनायी होगी

दिल के बदले पत्थर की एक, मूरत सी सजायी होगी

भूल के उसने उस मूरत में, जान कहाँ से पायी होगी

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

असली-नकली चेहरे देखे, दिल पे सौ-सौ पहरे देखे

असली-नकली चेहरे देखे, दिल पे सौ-सौ पहरे देखे

मेरे दुखते दिल से पूछो, क्या-क्या ख्वाब सुनहरे देखे

टूटे ख्वाबों की गलियों में, क्या-क्या ख्वाब सुनहरे देखे

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी

जब हारने वाली पार्टी ईवीएम पर दोष मढ़ती है, तो दृश्य बिल्कुल दिल ही टूट गया, अब जी कर क्या करेंगे जैसा हो जाता है। लेकिन जैसे ही वही पार्टी किसी दूसरे राज्य में जीतती है, तो अचानक ईवीएम की आवाज मधुबन खुशबू देता है की तरह सुरीली लगने लगती है। शायद राजनीति का असली मजा इसी अनाड़ीपन में है। यहाँ कोई परमानेंट दुश्मन नहीं, कोई फिक्स्ड पार्टनर नहीं। यहाँ बस एक ही धुन बजती है— पइसा बोलता है और कुर्सी मांगता है। बाकी सब तो बस बैकग्राउंड म्यूजिक है जो जनता को बहलाने के लिए बजता रहता है। तो अपना अपना मन बहलाते रहिए। वैसे भी रांची में नगर निगम चुनाव का जोर है। ज्यादा सक्रिय हैं तो किसी प्रत्याशी को पकड़ लीजिए। हर शाम को रंगीन बनाने का इंतजाम हो जाएगा।