Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Mukesh Sharma ने कांवड़ सेवा शिविर में युवाओं से सेवा और सामाजिक दायित्व निभाने का किया आह्वान राहुल गांधी की पोस्ट पर किरेन रिजिजू का पलटवार, कहा— "राहुल की सोच बदली, उम्मीद है महिला आरक्षण बिल ... पेट्रोल-डीजल के ताज़ा रेट जारी: दिल्ली, मुंबई से पटना तक जानें 8 अगस्त के दाम; क्रूड ऑयल पर ईरान-ओमा... जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ CIK का बड़ा एक्शन, सिम कार्ड दुरुपयोग और UAPA मामलों में कई जिलों ... कर्नाटक के कलबुर्गी में बाढ़ से बिगड़े हालात, उफनती कमलावती नदी में ट्रैक्टर पर शव ले जाकर हुआ अंतिम... बरेली में गजब कारनामा: संदिग्ध परिस्थितियों में गायब महिला दूसरे समुदाय के युवक के घर डबल बेड के नीच... कानपुर देहात में प्रेमी जोड़े को तालिबानी सजा: रस्सी से बांधकर लाठी-डंडों से पीटा, वीडियो वायरल होने ... यूपी में सियासी घमासान: "सपा गिरगिट की तरह रंग बदलती है"— मायावती और बृजेश पाठक का अखिलेश यादव पर ती... कांवड़ यात्रा नियम: सावन शिवरात्रि पर जल चढ़ाने के बाद भी रखें इन बातों का ध्यान, न करें ये गलतियां कश्मीरी विस्थापितों की वापसी पर संसदीय पैनल की रिपोर्ट: सुरक्षा व आजीविका के आकलन का निर्देश, मिलेगा...

हर साल अरबों खरबों का दान चुपचाप देता है आम आदमी

भारत में सांस्कृतिक विरासत में यह पुण्य कार्य

  • आम भारतीय ज्यादा दान करता है

  • हर साल 540 अरब रुपये का दान

  • महिलाओं बेसहारों को गुप्त दान देती हैं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत में परोपकार की चर्चा अक्सर बड़े कॉर्पोरेट घरानों, सीएसआर बजट और अरबपतियों द्वारा दिए जाने वाले भारी-भरकम दान के इर्द-गिर्द सिमटी रहती है। लेकिन अशोका यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैंथ्रोपी की ताज़ा रिपोर्ट हाउ इंडिया गिव्स 2025 ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दान की असली शक्ति संस्थागत पैसा नहीं, बल्कि आम भारतीय परिवार हैं। रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, भारतीय परिवार सालाना लगभग 540 अरब रुपये (करीब 6 बिलियन डॉलर) का दान करते हैं। इसमें नकद राशि के अलावा वस्तु दान और स्वेच्छा से दी गई सेवा भी शामिल है। सर्वेक्षण में शामिल 68 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे किसी न किसी रूप में दान देते हैं। इसमें 48 फीसद हिस्सा भोजन, कपड़े और घरेलू वस्तुओं का है, जबकि 44 प्रतिशत नकद दान और 30 फीसद लोग धार्मिक या सामाजिक समूहों में श्रमदान करते हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी की जिन्नी उप्पल के अनुसार, भारत में दान की प्रकृति विशिष्ट वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीनी और व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित है। लगभग 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं के लिए दान का मुख्य प्रेरक धार्मिक कर्तव्य और नैतिक जिम्मेदारी है।

शहरी क्षेत्रों में दान का बड़ा हिस्सा भिखारियों और जरूरतमंदों को जाता है, जबकि ग्रामीण भारत में धार्मिक संस्थान दान प्राप्त करने में सबसे आगे हैं। इसके अलावा पशु पक्षियों की सेवा दान का ही एक स्वरुप है, जहां लोग बेजुबान जानवरों को नियमित तौर पर खाना खिलाते हैं और गर्मी के दिनों में उनके लिए पानी की व्यवस्था करते हैं। ऐसे कार्यों का कोई रिकार्ड भी नहीं हैं, लिहाजा इसमें कितना धन खर्च होता है, उसका आकलन भी नहीं किया जा सका है।

यह रिपोर्ट बताती है कि दान देने का जज्बा सिर्फ अमीरों तक सीमित नहीं है। जिन परिवारों का मासिक खर्च मात्र 4,000 से 5,000 रुपये है, उनमें से भी लगभग आधे परिवार नियमित दान करते हैं। जैसे-जैसे आय और शिक्षा का स्तर बढ़ता है, दान में भागीदारी 80 फीसद तक पहुँच जाती है। दिलचस्प बात यह है कि पुरुष प्रधान परिवार धार्मिक कार्यों में अधिक दान देते हैं, जबकि महिला प्रधान परिवारों का झुकाव बेसहारा लोगों की मदद की ओर थोड़ा अधिक देखा गया है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में हर रोज का दान कुल निजी दान का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था और घरेलू खपत बढ़ रही है, आने वाले समय में आम नागरिकों द्वारा किए जाने वाले इस दान के और अधिक संगठित होने और बढ़ने की प्रबल संभावना है। विकसित देशों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में भारत में अभी भी व्यक्तिगत स्तर पर सीधा दान अधिक प्रचलित है, जो हमारी संस्कृति की गहराई को दर्शाता है।