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विदेशी मीडिया ने कुव्यवस्था की पोल खोल दी

भव्य आयोजन के प्रदर्शन पर इस पर तिकड़म फेल

  • तुलनात्मक आंकड़े भी पेश कर दिये

  • रिसर्च के अंतर का उल्लेख किया

  • सिर्फ आयोजन से तरक्की नहीं

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 जहाँ एक ओर भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं का प्रदर्शन कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके उद्घाटन के दौरान हुई अव्यवस्था ने सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। समिट के शुरुआती चरण में सामने आए कुप्रबंधन और सुरक्षा संबंधी सख्तियों के कारण न केवल घरेलू स्तर पर विपक्ष ने निशाना साधा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी भारत की आयोजन क्षमता और एआई रणनीति पर सवाल उठाए हैं।

नियोसैपियन और बोलना जैसे स्टार्टअप्स के संस्थापकों ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा किया। कुछ उद्यमियों ने दावा किया कि सुरक्षा घेरे के बावजूद उनके कीमती एआई वेयरेबल्स चोरी हो गए। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इन असुविधाओं के लिए सार्वजनिक रूप से खेद जताया है। इसके अतिरिक्त, गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा एक चीनी रोबोट डॉग को अपना बताने के दावे ने भी सोशल मीडिया पर खासी किरकिरी कराई।

अमेरिकी आउटलेट ने इसे भारत के सबसे बड़े कारोबारी शिखर सम्मेलन के लिए एक झटका बताया। रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के कारण सैकड़ों विदेशी प्रतिनिधि घंटों तक बिना भोजन और पानी के परिसर में फंसे रहे। रॉयटर्स ने लिखा कि आयोजन की कमियों ने भारत की तकनीकी क्षमता के संदेश को प्रभावित करने का जोखिम पैदा किया है।

जहाँ भारत खुद को एआई लीडर के रूप में पेश करना चाहता था, वहीं अव्यवस्था ने उसकी छवि को नुकसान पहुँचाया। फाइनेंशियल टाइम्स ने भारत की एआई महत्वाकांक्षा के मूल पर ही सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च जीडीपी का मात्र 0.7 फीसद है, जो चीन (2.5 प्रतिशत) और अमेरिका (3.5 प्रतिशत) के मुकाबले बेहद कम है।

उसने साफ किया कि केवल आयोजन करने से एआई की रेस नहीं जीती जा सकती। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया कि वैश्विक एआई सुपरकंप्यूटिंग में अमेरिका की 75 फीसद हिस्सेदारी है, जबकि भारत का निवेश अभी बहुत शुरुआती स्तर पर है। चीन के ग्लोबल टाइम्स ने भारत के डेटा सिटी और एआई खाके को प्रभावशाली तो बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि बुनियादी रिसर्च और संसाधनों के मामले में भारत को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है।

समिट में 20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति ने इसे एक बड़ा कूटनीतिक मंच तो बना दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को ग्लोबल साउथ का एआई लीडर बनना है, तो उसे घरेलू स्तर पर स्किलिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और ठोस निवेश की दिशा में और अधिक गंभीर प्रयास करने होंगे।