इसरो के अंतरिक्ष परीक्षणों की विफलता के पीछे भितरघात
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पिछले माह कर गये गोपनीय दौरा
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तमाम तथ्यों की नये सिरे से जांच
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पीएम मोदी ने निर्देश जारी किये हैं
राष्ट्रीय खबर
तिरुवनंतपुरम: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, जिसे दुनिया भर में अपनी अचूक सटीकता और किफायती मिशनों के लिए जाना जाता है, वर्तमान में एक कठिन दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ महीनों के अंतराल में इसरो को दो बड़े झटके लगे हैं, जिसने न केवल वैज्ञानिकों को बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियों को भी चिंता में डाल दिया है। इन विफलताओं ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को किसी बाहरी या आंतरिक भितरघात के जरिए निशाना बनाया जा रहा है?
इस संकट की शुरुआत 18 मई 2025 को हुई थी, जब एक महत्वपूर्ण मिशन अपने लक्ष्य तक पहुँचने में विफल रहा। इसके बाद, हाल ही में 12 जनवरी 2026 को इसरो का एक और महत्वाकांक्षी मिशन, जिसमें एक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और कुछ अन्य उपग्रह भेजे जाने थे, तकनीकी खराबी की भेंट चढ़ गया। जांच में सामने आया कि प्रक्षेपण के तीसरे चरण में रॉकेट के इंजन में खराबी आने के कारण मिशन विफल हुआ। इसरो के बेड़े में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल को सबसे विश्वसनीय यान माना जाता है, जिसे इसरो का वर्कहॉर्स भी कहते हैं। ऐसे भरोसेमंद रॉकेट का लगातार दो बार विफल होना असाधारण माना जा रहा है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं हस्तक्षेप किया। उनके निर्देश पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने 22 जनवरी 2026 को तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र का दौरा किया। यह दौरा इतना गोपनीय था कि इसकी जानकारी संस्थान के उच्च अधिकारियों के सीमित दायरे तक ही थी। चूंकि पीएसएलवी रॉकेट का निर्माण और डिजाइन मुख्य रूप से यहीं पर किया जाता है, इसलिए डोभाल ने वहां के वैज्ञानिकों और सुरक्षा प्रभारियों के साथ लंबी समीक्षा बैठक की। उन्होंने प्रक्षेपण यान की आपूर्ति श्रृंखला, कलपुर्जों की गुणवत्ता और साइबर सुरक्षा जैसे विभिन्न पहलुओं पर गहन जानकारी ली।
हालांकि, केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद और मीडिया के समक्ष किसी भी प्रकार की साजिश या भितरघात की आशंका को फिलहाल खारिज किया है। सूत्रों का कहना है कि मंत्री का यह बयान डोभाल की प्राथमिक गोपनीय रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें फिलहाल तकनीकी खामियों को ही प्रमुख कारण माना गया है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियां अभी भी सतर्क हैं क्योंकि अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती शक्ति कई वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों के लिए चुनौती बनी हुई है।
लगातार दो विफलताओं ने इसरो के आगामी गगनयान जैसे बड़े मिशनों की समयसीमा और सुरक्षा ऑडिट पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। अब वैज्ञानिक और सुरक्षा एजेंसियां मिलकर भविष्य के प्रक्षेपणों के लिए एक नया ज़ीरो-एरर प्रोटोकॉल तैयार कर रही हैं।