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जानकार और विशेषज्ञ ही तय करेंगे अरावली की परिभाषा

सुप्रीम कोर्ट ने पैनल बनाने का सुझाव दिया

  • सभी विधाओँ के जानकार इसमें रहेंगे

  • खनन के नफा नुकसान का आकलन होगा

  • पर्यावरण को ही शीर्ष प्राथमिकता देनी होगी

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने दुनिया की सबसे पुरानी और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली पर्वतमाला को ‘परिभाषित’ करने और वहां अनुमत गतिविधियों के लिए एक रोडमैप तैयार करने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक टीम गठित करने का प्रस्ताव दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का इरादा एक ऐसा विशेषज्ञ पैनल बनाने का है जिसमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हों। यह टीम न केवल अरावली की भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाएं तय करेगी, बल्कि इस क्षेत्र में विनियमित खनन जैसी गतिविधियों की संभावनाओं पर भी विचार करेगी।

दशकों से अरावली की सटीक कानूनी और भौगोलिक परिभाषा को लेकर अस्पष्टता रही है। विभिन्न राज्यों (जैसे राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात) में इसके विस्तार और सुरक्षा मानकों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। कोर्ट का मानना है कि एक स्पष्ट परिभाषा अवैध अतिक्रमण और अनियंत्रित खनन को रोकने में सहायक होगी।

पारिस्थितिक संवेदनशीलता बनाम विकास: अरावली न केवल जैव विविधता का केंद्र है, बल्कि यह उत्तर भारत के लिए एक ‘ग्रीन वॉल’ के रूप में कार्य करती है जो मरुस्थलीकरण को रोकती है। न्यायालय ने संकेत दिया है कि वह पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सतत विकास का रास्ता खोजना चाहता है, जहां कड़े नियमों के तहत कुछ आर्थिक गतिविधियों की अनुमति दी जा सके।

इस पैनल में पर्यावरणविद्, भूविज्ञानी, प्रशासनिक अधिकारी और कानूनी विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। यह पैनल अरावली की वर्तमान स्थिति का आकलन करेगा और एक ऐसी कार्ययोजना तैयार करेगा जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखे। अदालत ने स्पष्ट किया कि अरावली का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन वे उन क्षेत्रों की पहचान भी करना चाहते हैं जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना सीमित गतिविधियां की जा सकती हैं। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर ही भविष्य में खनन और निर्माण कार्यों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।