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धारा 17ए किसके फायदे के लिए बनाया गया है

सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला आया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए, जिसे जुलाई 2018 में एक संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था, जांच एजेंसियों के लिए एक अनिवार्य शर्त रखती है। इसके अनुसार, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले सक्षम सरकारी अधिकारी की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। हाल ही में, 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस पर एक खंडित फैसला सुनाया, जिसके बाद अब यह मामला एक बड़ी पीठ के पास भेजा जाएगा। इस मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने परस्पर विरोधी राय दी है:

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना का रुख (पुरानी शराब नई बोतल में): न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। उनका तर्क है कि यह धारा दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6ए का ही दूसरा रूप है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। उन्होंने कहा कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है क्योंकि यह उच्च स्तर के अधिकारियों को तो सुरक्षा देती है लेकिन निचले स्तर के कर्मचारियों को जांच के लिए खुला छोड़ देती है। उनके अनुसार, पूर्व अनुमति की शर्त भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के उद्देश्य को विफल करती है और भ्रष्ट अधिकारियों को ढाल प्रदान करती है।

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने धारा 17ए की वैधता को बरकरार रखा। उनका मानना है कि इस धारा को पूरी तरह खत्म करना बच्चे को नहाने के पानी के साथ बाहर फेंकने जैसा होगा। उन्होंने तर्क दिया कि यदि ईमानदार अधिकारियों को तुच्छ शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा नहीं दी गई, तो वे निर्णय लेने से डरेंगे, जिससे देश में नीतिगत पंगुता की स्थिति पैदा हो जाएगी। हालांकि, उन्होंने एक महत्वपूर्ण संशोधन का सुझाव दिया कि अनुमति देने का अधिकार सरकार के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त के पास होना चाहिए ताकि हितों का टकराव  न हो।

यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने ऐसा कवच देने की कोशिश की है। 1969 का सिंगल डायरेक्टिव और 2003 की धारा 6ए भी इसी तरह के प्रयास थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण बनाम भारत संघ और सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ मामलों में रद्द कर दिया था। अब बड़ी पीठ का फैसला यह तय करेगा कि क्या 2026 में भारत का भ्रष्टाचार विरोधी कानून एक नई दिशा लेगा या पुराने न्यायिक मिसालों पर ही टिका रहेगा।