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कोलकाता के धंसने की गति तेज हो गयी है

नये शोध में खतरा और तेजी से करीब आता दिखा

  • समुद्र के जलस्तर से बड़ा है खतरा

  • भूजल दोहन इसका प्रमुख कारण है

  • नये इलाकों में उभार देखा गया

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः एक नए शोध ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और भारत के प्रमुख डेल्टा क्षेत्रों (गंगा-ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी और महानदी) को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। इस अध्ययन के अनुसार, इन क्षेत्रों में ज़मीन धंसने की दर क्षेत्रीय समुद्र स्तर के बढ़ने की दर से कहीं अधिक तेज़ है।

इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में कोलकाता जैसे तटीय शहरों पर बाढ़ और जलमग्न होने का खतरा समुद्र के बढ़ने से कहीं ज्यादा खुद ज़मीन के नीचे धंसने से है। दुनिया भर के 40 डेल्टा क्षेत्रों के विश्लेषण में पाया गया कि भारत के पूर्वी हिस्से के तीन प्रमुख डेल्टा उन 19 क्षेत्रों में शामिल हैं जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रभावित है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस धंसान का सबसे बड़ा कारण भूजल का अंधाधुंध दोहन है। यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के जलवायु वैज्ञानिक रॉबर्ट निकोल्स के अनुसार, हर उस डेल्टा में जिसे उन्होंने मॉनिटर किया, कम से कम कुछ हिस्सा ऐसा है जो समुद्र की सतह के बढ़ने की तुलना में अधिक तेजी से नीचे की ओर धंस रहा है। ब्राह्मणी और महानदी जैसे क्षेत्रों में धंसने की दर सालाना 4 मिमी से भी अधिक है।

कोलकाता की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। यहाँ ज़मीन धंसने की दर वैश्विक औसत के बराबर या उससे अधिक पाई गई है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा 2023 में किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन में भी कोलकाता में प्रति वर्ष 4 मिमी से 12 मिमी के बीच धंसान दर्ज की गई थी। हुगली नदी के पश्चिमी क्षेत्रों में नए सब्सिडेंस ज़ोन उभर रहे हैं, जो सीधे तौर पर गिरते भूजल स्तर से जुड़े हैं।

हालांकि, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के भूभौतिकीविद् भगवान सिंह चौधरी ने एक उम्मीद की किरण भी दिखाई है। उन्होंने बताया कि 2017 से 2021 के बीच जिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूजल पुनर्भरण के उपाय किए गए, वहां धंसने की दर में 2 मिमी से 3 मिमी की कमी आई है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि हमें बुनियादी ढांचे के डिजाइन कोड में बदलाव करने और जल प्रबंधन में भारी निवेश करने की तत्काल आवश्यकता है, अन्यथा दुनिया भर में करीब 23.6 करोड़ लोग गंभीर बाढ़ के खतरे की चपेट में आ सकते हैं।