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संघीय ढांचे पर गहराता संकट

भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में असहमति को सबसे सुरक्षित वाल्व माना गया है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली की सड़कों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे इस वाल्व के बंद होने का संकेत दे रही हैं। शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय के बाहर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों की गिरफ्तारी और उनके साथ हुआ व्यवहार केवल एक राजनीतिक दल का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक मर्यादा पर प्रश्नचिह्न है जो निर्वाचित प्रतिनिधियों को गरिमा प्रदान करती है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह कहना कि यह वर्दी में अहंकार का प्रदर्शन है, सत्ता के केंद्रीकरण और विपक्षी आवाजों के दमन की एक गहरी व्यथा को उजागर करता है। इस पूरे विवाद की जड़ में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली है। हाल ही में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई पैक के खिलाफ हुई कार्रवाई ने आग में घी डालने का काम किया है।

जब विपक्षी दल इन एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के खिलाफ गृह मंत्रालय जैसे सत्ता के केंद्रों पर शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने पहुँचते हैं, तो उन्हें सुनने के बजाय सड़कों पर घसीटा जाना भारतीय राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सही कहा है कि लोकतंत्र भाजपा की निजी संपत्ति नहीं है।

जब एक निर्वाचित सांसद, जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, अपनी आवाज उठाने पर अपमानित किया जाता है, तो संदेश स्पष्ट होता है सत्ता अब तर्क में नहीं, बल्कि बल में विश्वास करती है। यह आज्ञापालन बनाम असहमति का वह द्वंद्व है, जहाँ असहमति को अपराध की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है।

संपादकीय दृष्टि से देखें तो चिंता का विषय केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि दोहरा मापदंड है। बनर्जी का यह आरोप गंभीर है कि जहाँ सत्तापक्ष के नेताओं को हर तरह के विशेषाधिकार प्राप्त हैं, वहीं विपक्ष के लिए केवल हिरासत और अपमान की व्यवस्था है। राजनीति में नैतिकता और सम्मान पारस्परिक होना चाहिए। यदि केंद्र सरकार विपक्षी प्रतिनिधियों का सम्मान नहीं करेगी, तो सहयोगपूर्ण संघवाद की अवधारणा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।

ममता बनर्जी की चेतावनी कि आप हमें सड़क पर घसीटेंगे, तो हम आपको संवैधानिक नैतिकता पर वापस लाएंगे, यह संकेत देती है कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य के बीच टकराव और बढ़ेगा। यह हमारा भारत बनाम सत्ता का भारत की एक ऐसी लड़ाई है जिसमें आम नागरिक की संवैधानिक गरिमा दांव पर लगी है। विपक्ष का यह आरोप कि जांच एजेंसियां केवल चुनाव से पहले या राजनीतिक प्रतिशोध के लिए सक्रिय होती हैं, अब जनमानस में भी चर्चा का विषय है।

आई पैक जैसी संस्थाओं पर छापेमारी को टीएमसी ने सीधे तौर पर बंगाल की सत्ता संरचना पर हमला माना है। जब मुख्यमंत्री स्वयं किसी छापेमारी स्थल पर पहुँचकर साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों का सामना करती हैं और जवाब में सांसदों को दिल्ली में हिरासत में लिया जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि कानूनी लड़ाई अब पूरी तरह से राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुकी है।

लोकतंत्र में सम्मान किसी कुर्सी, बैज या सत्ता के पद का मोहताज नहीं होना चाहिए। जैसा कि ममता बनर्जी ने जोर दिया, नागरिक अधिकार जन्मजात हैं, न कि किसी सरकार की कृपा। आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच संवाद का एक ऐसा तंत्र विकसित हो जहाँ एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल न उठें।

वर्दी का अहंकार और सत्ता की हनक क्षणिक हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं को पहुँचाई गई क्षति स्थायी होती है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने के लिए सड़कों पर घसीटा जाएगा, तो इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल होगी, बल्कि देश के भीतर भी असंतोष की ज्वाला भड़केगी।

समय आ गया है कि हम आज्ञापालन की मांग करने वाली राजनीति के बजाय विमर्श और सहिष्णुता वाली राजनीति की ओर लौटें, ताकि संवैधानिक नैतिकता का विचार जीवित रह सके। दूसरा खतरा यह भी है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आदेश और निर्देश अन्य विरोधी दलों को भी वही रास्ता दिखा रहे हैं यानी दमन का।

किसी दिन अगर सरकार बदल गयी तो शायद भाजपा के लोगों को भी इसी किस्म के अपमान से गुजरना पड़ेगा, इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए। वरना आज के दौर में यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अब ईडी को भाजपा का राजनीतिक हथियार बना दिया गया है, जिसका इस्तेमाल ठीक चुनाव करीब आने के समय होने लगता है। दूसरी तरफ ईडी को भी औपचारिक तौर पर यह बताना चाहिए कि टीएमसी के प्रत्याशियों की सूची में कौन से कोयला घोटाले के राज छिपे हुए थे, जिन्हें ममता बनर्जी ने उजागर कर दिया