सरकार अब सूचनाओँ के बाहर आने पर लगाम कस रही है
तेहरानः ईरान में गुरुवार शाम को पूरे देश में इंटरनेट सेवा पूरी तरह से ठप कर दी गई। यह कदम तब उठाया गया जब देश के विभिन्न हिस्सों में सरकार विरोधी प्रदर्शन उग्र हो गए। गिरती अर्थव्यवस्था और सुरक्षा बलों की सख्ती से नाराज ईरानी नागरिक सत्तारूढ़ धर्मतांत्रिक शासन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। राजधानी तेहरान और अन्य प्रमुख शहरों में प्रदर्शन शुरू होते ही अधिकारियों ने इंटरनेट और टेलीफोन लाइनें काट दीं। अब यह आंदोलन अपने दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। एक इंटरनेट वॉचडॉग ने इस ब्लैकआउट को संभावित हिंसक कार्रवाई का संकेत बताया है।
ईरान मानवाधिकार एनजीओ के अनुसार, 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुए इन प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 45 प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं, जिनमें आठ बच्चे भी शामिल हैं। सैकड़ों लोग घायल हैं और 2,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। कुर्द बहुल क्षेत्र ईलम से लेकर पूर्वोत्तर में मशहद तक, 100 से अधिक शहरों में लोग सड़कों पर हैं। प्रदर्शनकारी निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के समर्थन में यह आखिरी लड़ाई है, पहलवी वापस आएंगे जैसे नारे लगा रहे हैं। सोशल मीडिया पर पहलवी ने भी लोगों से एकजुट होकर अपनी मांगों के लिए आवाज उठाने का आह्वान किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंदोलन बेकाबू महंगाई और मुद्रा के गिरते मूल्य के कारण शुरू हुआ था, जो अब राजनीतिक बदलाव की मांग में बदल गया है। तेहरान के एक निवासी ने बताया कि बाजार में कीमतों में हर घंटे इजाफा हो रहा है, जिससे आम आदमी की क्रय शक्ति खत्म हो गई है। पत्रकार मसीह अलीनेजाद ने कहा कि लोग अब सुधार नहीं, बल्कि इस्लामिक गणराज्य का अंत चाहते हैं। प्रदर्शनों की शुरुआत तब हुई जब तेहरान के ग्रैंड बाजार के दुकानदारों ने सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ दुकानें बंद कर दीं। सरकार द्वारा दी जाने वाली मामूली नकद सहायता भी जनता के गुस्से को शांत करने में विफल रही है।
यह 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान का सबसे बड़ा जन आंदोलन है। इस बार खास बात यह है कि पारंपरिक रूप से शासन के वफादार माने जाने वाले बाजारी (व्यापारी वर्ग) भी विरोध में शामिल हैं। बाहरी मोर्चे पर, अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव ने शासन की चिंता और बढ़ा दी है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के वादे विफल साबित हो रहे हैं। जानकारों का मानना है कि ईरानी जनता अब शासन पर भरोसा खो चुकी है और सरकार के पास केवल दमनकारी बल का ही विकल्प बचा है।