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देवघर में फूलों की कमी बनी किसानों के लिए बड़ी चुनौती, सीमित संसाधनों में मधुमक्खी पालन कर रहे हैं किसान

देवघर: जिले में सब्जी उत्पादन और फूलों की खेती पहले से ही किसानों की आमदनी का जरिया रही है. अब धीरे-धीरे मधुमक्खी पालन भी किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रहा है. हालांकि जिले का प्राकृतिक वातावरण मधुमक्खी पालन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं है. बावजूद इसके किसान जोखिम उठाकर इस वैकल्पिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.

फंड की कमी और प्रशासनिक उदासीनता की वजह से बंद हुई ये योजना

देवघर में फिलहाल 50 के करीब किसान मधुमक्खी पालन से जुड़े हैं, जो सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बीच शहद उत्पादन के जरिए अपनी जीविका को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं. दरअसल, राज्य सरकार ने साल 2018 में मधुमक्खी पालन योजना की शुरुआत की थी लेकिन फंड की कमी और प्रशासनिक उदासीनता की वजह से यह योजना बीच रास्ते में ही ठप हो गई. उस समय कई किसानों को चिन्हित किया गया था लेकिन योजना बंद हो जाने से उन्हें कोई लाभ नहीं मिल सका.

2024-25 में फिर से शुरू हुई मधुमक्खी पालन योजना

लंबे अंतराल के बाद राज्य सरकार ने इस दिशा में पहल करते हुए 2024-25 में मधुमक्खी पालन योजना को दोबारा शुरू किया था. इस दौरान 26 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, जबकि 2025-26 में 15 नए किसानों को मधुमक्खी पालन की ट्रेनिंग दी जा रही है. सभी किसान शहद उत्पादन के जरिए अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद लगाए हुए हैं.

फूल और फलदार पेड़ों की कमी

देवघर के कोठिया गांव के किसान कृष्णा यादव बताते हैं कि उन्होंने विभाग से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया है. प्रशिक्षण के बाद सरकारी योजना के तहत उन्हें मधुमक्खी बॉक्स, छलनी, शहद जमा करने वाली प्लेट और ग्लव्स जैसी जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई गई है.

किसान का कहना है कि यह उनका पहला प्रयास है और विभाग की मदद से उन्हें बेहतर आमदनी की उम्मीद है. हालांकि किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती फूल और फलदार पेड़ों की कमी है. दूसरे किसान वकील यादव बताते हैं कि देवघर और आसपास के इलाकों में पर्याप्त फूल नहीं हैं, जिसकी वजह से मधुमक्खी शहद के लिए संघर्ष कर रही है. इसी वजह से अब किसान सरसों और फल-फूल की खेती पर भी जोर दे रहे हैं, ताकि मधुमक्खियों को पराग मिल सके.

किसानों के पास संसाधन एवं तकनीकी सहयोग की कमी

इस काम से जुड़े किसानों ने बताया कि मजबूरी में उन्हें मधुमक्खी बॉक्स लेकर जंगलों और सुदूर इलाकों में जाना पड़ता है ताकि मधुमक्खियों को शहद मिल सके. इसके अलावा समय पर संसाधन और तकनीकी सहयोग न मिलना भी इस व्यवसाय के विस्तार में बड़ी बाधा है. किसानों की समस्याओं को उद्यान पदाधिकारी यशराज कुमार ने भी स्वीकार किया है.

बजट सीमित होने की वजह से सभी इच्छुक किसानों तक योजना का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है. जो किसान गंभीरता से मधुमक्खी पालन करना चाहते हैं, उन्हें केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का त्वरित लाभ, तीन दिन का विशेष प्रशिक्षण और हरसंभव तकनीकी सहायता दी जा रही है. मधुमक्खी पालन के लिए भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसका नाम है ‘नेशनल बी कीपिंग एंड हनी मिशन’ (NBHM) है. यदि इच्छुक किसान अपने स्थानीय कृषि मित्र से मिलकर इस योजना का लाभ लेना चाहते हैं तो वह आसानी से ले सकते हैं. यशराज कुमार, उद्यान पदाधिकारी

गौरतलब है कि देवघर शहर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में भी फल-फूलों के पेड़ों की भारी कमी है, जिससे मधुमक्खी पालन करने वाले किसानों की राह और कठिन हो गई है. क्या सीमित संसाधनों और प्राकृतिक चुनौतियों के बीच मधुमक्खी पालन देवघर के किसानों की आय का मजबूत आधार बन पाएगी?