कर्नाटक सरकार का केंद्र से टकराव तय
राष्ट्रीय खबर
बेंगलुरुः कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक मंत्रिमंडल ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को निरस्त कर उसकी जगह विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी जी राम जी कानून लाने के केंद्र के फैसले की कड़ी निंदा की है।
राज्य सरकार इस नए कानून को कर्नाटक में लागू न करने और इसके विकल्प के रूप में अपना खुद का रोजगार गारंटी कानून लाने पर विचार कर रही है। कानून और संसदीय मामलों के मंत्री एच.के. पाटिल ने कहा कि यह कदम पंचायतों के विकेंद्रीकरण और उनकी स्वायत्तता को खत्म करने वाला है।
कर्नाटक सरकार की मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि नया कानून रोजगार की मांग आधारित व्यवस्था को खत्म कर इसे ‘सप्लाई-ड्रिवन’ यानी केंद्र द्वारा तय की जाने वाली योजना बना देता है। इसके अलावा, केंद्र और राज्यों के बीच फंड शेयरिंग का अनुपात, जो पहले 90:10 था, उसे बदलकर अब 60:40 कर दिया गया है।
राज्य सरकार का तर्क है कि इससे कर्नाटक जैसे राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, जो पहले से ही जीएसटी मुआवजे और राजस्व हस्तांतरण में कमी की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में इसे असंवैधानिक और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है।
पंचायत राज मंत्री प्रियांक खरगे ने कहा कि मनरेगा के माध्यम से पिछले ढाई वर्षों में गांवों में 17 लाख संपत्तियां बनाई गईं और 80 लाख परिवारों को रोजगार मिला। नया कानून न केवल बजट में कटौती करता है, बल्कि साल में 60 दिनों तक काम बंद रखने का भी प्रावधान करता है, जिससे कृषि संकट के समय गरीब मजदूरों के लिए आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा।
कर्नाटक सरकार अब अपनी अलग योजना के माध्यम से ‘महात्मा गांधी’ के नाम को बरकरार रखने और पंचायतों को अधिकार देने की तैयारी कर रही है। यह विवाद आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के संबंधों के बीच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।