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चौतरफा आलोचना होने के बाद चुनाव आयोग को ध्यान आया

बुजुर्गों को केंद्रों तक ना बुलाया जाए

  • तीन दिनों से मिल रही थी शिकायत

  • केंद्रों पर अतिरिक्त व्यवस्था नहीं

  • अपने ही पुराने निर्देश को बदला

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रियाओं को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि 85 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी मतदाता, गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति या दिव्यांग को विशेष जांच रिपोर्ट से संबंधित सुनवाई के लिए भौतिक रूप से कार्यालय बुलाया गया, तो इसके लिए जिम्मेदार बीएलओ और उनके पर्यवेक्षक के खिलाफ तत्काल और सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

यह निर्देश उन मीडिया रिपोर्टों के बाद आया है जिनमें बताया गया था कि किस तरह अत्यधिक वृद्ध और शारीरिक रूप से अक्षम मतदाताओं को चिलचिलाती धूप या लंबी कतारों में घंटों खड़ा रहना पड़ता था। बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने राज्य के सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों और जिला मजिस्ट्रेटों को सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि जो मतदाता चलने-फिरने में असमर्थ हैं या जिन्होंने विशेष अनुरोध किया है, उन्हें किसी भी कीमत पर सुनवाई केंद्रों पर न बुलाया जाए।

आयोग ने कार्यप्रणाली में सुधार करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया है। यदि संबंधित मतदाताओं को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं, तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उन्हें फोन के माध्यम से सूचित करें कि उन्हें कार्यालय आने की आवश्यकता नहीं है। बीएलओ अब स्वयं ऐसे मतदाताओं के निवास स्थान पर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करेंगे। यह कार्य मुख्य सुनवाई प्रक्रिया के अंतिम सप्ताह में संपन्न किया जाएगा। इस नियम के दायरे में न केवल बुजुर्ग और दिव्यांग, बल्कि गर्भवती महिलाओं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी रखा गया है।

चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि निर्देशों के बावजूद कई जिलों से ऐसी शिकायतें मिलीं जहाँ बीमार व्यक्तियों और बैसाखियों के सहारे चलने वाले लोगों को केंद्रों पर बुलाया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी घटनाएं न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं, बल्कि इससे चुनाव आयोग की छवि भी धूमिल होती है।

आयोग ने अब बीएलओ पर्यवेक्षकों की सीधी जिम्मेदारी तय की है। प्रशासन का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि लोकतंत्र के इस उत्सव में हर नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित हो, लेकिन उनकी शारीरिक सीमाओं और गरिमा की कीमत पर नहीं। यह पहल चुनाव प्रणाली को अधिक समावेशी, सुलभ और मानवीय बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर मानी जा रही है।