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अरावली पहाड़ियों पर नवंबर का फैसला स्थगित

जन प्रतिरोध के बाद अपने ही पूर्व फैसले से पीछे हटा शीर्ष अदालत

  • ऊँचाई के मानक पर कानूनी पेंच फंसा

  • पुराने फैसले का संदर्भ और प्रभाव देखा

  • पर्यावरणविदों और राजनीतिक दलों की चिंता

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: अरावली पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व और उसकी तकनीकी परिभाषा को लेकर छिड़ी कानूनी जंग में एक नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने पिछले महीने के उस फैसले को फिलहाल स्थगित रखने का आदेश दिया, जिसमें अरावली की एक नई और सीमित परिभाषा को स्वीकार किया गया था। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अरावली की पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए अब एक नई विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा, जो गहन सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस मामले की अगली सुनवाई अब 21 जनवरी को होगी।

अदालत की मुख्य चिंता अरावली को परिभाषित करने के लिए तय किए गए 100 मीटर के मानक को लेकर है। दरअसल, पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों को ऐसी भौगोलिक आकृतियों के रूप में परिभाषित किया था जिनकी ऊँचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक हो। मुख्य न्यायाधीश ने अब इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जताई है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पहाड़ियों को केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई तक सीमित करने से उन छोटे टीलों और निचली पर्वत श्रृंखलाओं को गैर-अरावली घोषित कर दिया जाएगा, जहाँ वर्तमान में खनन प्रतिबंधित है? कोर्ट को आशंका है कि इस संकीर्ण परिभाषा का लाभ उठाकर भू-माफिया और खनन कंपनियाँ उन क्षेत्रों में अनियंत्रित खनन शुरू कर सकती हैं जिन्हें अब अरावली के दायरे से बाहर माना जाने लगेगा।

गौरतलब है कि 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के लिए अरावली की एक समान परिभाषा को मंजूरी दी थी। साथ ही, विशेषज्ञों की अंतिम रिपोर्ट आने तक इन राज्यों में नए खनन पट्टों के आवंटन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। समिति ने सिफारिश की थी कि 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक पहाड़ियों के समूह को अरावली रेंज माना जाए। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सरकार कोर्ट के हर निर्णय का पालन करने और सतत खनन के लिए प्रबंधन योजना तैयार करने के लिए तैयार है।

इस परिभाषा को लेकर पर्यावरणविदों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् विमलेंदु के. झा ने कहा कि अरबों वर्षों पुराने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को केवल ऊँचाई के पैमाने पर फिर से परिभाषित करना वैज्ञानिक रूप से गलत है। उन्होंने इसे उत्तरी भारत की जल संप्रभुता, वायु गुणवत्ता और जलवायु सुरक्षा पर सीधा प्रहार बताया है।

दूसरी ओर, इस मुद्दे ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र और राजस्थान की डबल इंजन सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की सिफारिशों को दरकिनार कर अरावली को रियल एस्टेट और खनन के लिए खोला जा रहा है। रमेश के अनुसार, यदि इस ऐतिहासिक श्रृंखला को संकीर्ण परिभाषाओं में उलझाया गया, तो पहले से ही संकटग्रस्त अरावली का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा।