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ग्लोबल वार्मिंग का सीधा परिणाम क्या होगा, यह बता दिया बारिश ने

एशिया में सुपरचार्ज्ड मानसून और जलवायु रिपोर्ट

नईदिल्लीः दिसंबर 2025 में जारी जलवायु वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया के भविष्य को लेकर चिंताजनक आंकड़े पेश किए हैं। इस वर्ष के मानसून सत्र का विश्लेषण करते हुए विशेषज्ञों ने इसे सुपरचार्ज्ड मानसून की संज्ञा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में बारिश की तीव्रता पिछले औसत की तुलना में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक अधिक दर्ज की गई। यह कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्रों और वायुमंडल के बीच बदलते संतुलन का सीधा परिणाम है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर की सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गया है। भौतिकी के साधारण नियम के अनुसार, गर्म हवा अधिक नमी सोखती है। समुद्र के गर्म होने से वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ गई, जिसके कारण मानसून की हवाएं पहले से कहीं अधिक भारी और शक्तिशाली होकर भारतीय उपमहाद्वीप और वियतनाम की ओर बढ़ीं।

इस रिपोर्ट में क्लाइमेट शिफ्ट नामक शब्द का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ है कि अब बारिश पूरे मौसम में समान रूप से नहीं फैल रही है, बल्कि कम समय में बहुत अधिक बारिश और क्लाउट बर्स्ट होने की घटनाएं बढ़ गई हैं। इस साल भारत, बांग्लादेश और वियतनाम में देखी गई भीषण बाढ़ इसी का परिणाम थी। इसके अतिरिक्त, मध्य एशिया में चली भीषण हीटवेव ने हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के ग्लेशियरों को तेजी से पिघलाया। इस पिघली हुई बर्फ ने पहले से ही उफनती नदियों में और पानी भर दिया, जिससे मैदानी इलाकों में प्रलयकारी स्थिति पैदा हो गई।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हमारे पुराने बांध, कंक्रीट की सड़कें और ड्रेनेज सिस्टम अब इस सुपरचार्ज्ड बारिश को झेलने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। शहरों को अब स्पंज सिटी के मॉडल पर विकसित करना होगा। यह एक ऐसा शहरी नियोजन है जहाँ सड़कों और पार्कों को इस तरह बनाया जाता है कि वे बारिश के अतिरिक्त पानी को सोखकर जमीन के नीचे भेज सकें, जिससे सड़कों पर बाढ़ न आए और जल संचयन भी हो सके।

यह रिपोर्ट केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी बड़ा सवालिया निशान लगाती है। अरबों डॉलर की फसलों की बर्बादी ने एशिया में खाद्यान्न संकट का खतरा पैदा कर दिया है। अब समय आ गया है कि एशिया के देश मिलकर जलवायु अनुकूलन की दिशा में ठोस कदम उठाएं।