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स्पर्श महसूस करने वाली कृत्रिम त्वचा तैयार

चिकित्सा और रोबोटिक्स में क्रांतिकारी कदम सामने आया

  • सेंसर और लचीले पदार्थों से बना है

  • दबाव,कंपन और तापमान समझता है

  • सीधे तंत्रिकाओँ तक भेजता है संकेत

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हाल ही में, वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में एक अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। उन्होंने एक ऐसी कृत्रिम मानव त्वचा विकसित की है जो न केवल देखने में वास्तविक त्वचा जैसी है, बल्कि यह स्पर्श को भी महसूस करने और प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। यह वैज्ञानिक उपलब्धि बायो-इंजीनियरिंग और मटेरियल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है, जिससे चिकित्सा, प्रोस्थेटिक्स और रोबोटिक्स के भविष्य को पूरी तरह से बदला जा सकता है।

यह नवीन कृत्रिम त्वचा संवेदनशील सेंसर और अत्यधिक लचीले पदार्थों के संयोजन से बनाई गई है। यह सेंसर नेटवर्क इतना परिष्कृत है कि यह दबाव, तापमान और कंपन जैसी बाहरी उत्तेजनाओं को पहचान सकता है। जब त्वचा पर स्पर्श किया जाता है, तो ये सेंसर एक विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं। यह संकेत मानव तंत्रिका तंत्र की नकल करते हुए, बाहरी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों या सीधे तंत्रिकाओं तक प्रेषित किया जाता है।

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इस तकनीक में इस्तेमाल किए गए पदार्थ बायोकंपैटिबल हैं, जिसका अर्थ है कि मानव शरीर उन्हें आसानी से स्वीकार कर सकता है, जिससे यह चिकित्सा अनुप्रयोगों के लिए आदर्श बन जाता है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि भविष्य में यह त्वचा न केवल स्पर्श महसूस करे, बल्कि दर्द या गर्मी जैसी जटिल संवेदनाओं को भी भेद सके।

इस खोज के निहितार्थ अत्यंत व्यापक हैं। जिन रोगियों ने जलने या दुर्घटनाओं के कारण अपनी त्वचा खो दी है, उनके लिए यह कृत्रिम त्वचा एक वरदान साबित हो सकती है। यह न केवल सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करेगी, बल्कि उन्हें खोई हुई स्पर्श की भावना भी वापस दिलाएगी। वर्तमान कृत्रिम अंग प्रायः संवेदनाहीन होते हैं। इस त्वचा को कृत्रिम अंगों पर लगाने से उपयोगकर्ताओं को यह महसूस करने की क्षमता मिलेगी कि वे क्या पकड़ रहे हैं, जिससे कृत्रिम अंगों का उपयोग अधिक सहज और प्रभावी हो जाएगा।

रोबोटिक्स: रोबोटिक्स के क्षेत्र में यह एक क्रांति ला सकती है। संवेदनशील त्वचा से लैस रोबोट नाजुक वस्तुओं को बिना नुकसान पहुंचाए पकड़ने में सक्षम होंगे और मानव-रोबोट सहयोग अधिक सुरक्षित हो जाएगा। यह सफलता वैज्ञानिकों को जैविक और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के बीच की खाई को पाटने के करीब लाती है, जिससे भविष्य में बायोनिक मनुष्य  की अवधारणा को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।

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