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चीन को हिंद महासागर में अपनी सक्रियता बढ़ाने का मौका

ओमान में नौसैनिक अड्डा को स्वीकृति मिली है

दुबईः मध्य पूर्व के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश ओमान में चीन द्वारा एक संभावित नौसैनिक अड्डे की स्थापना की रिपोर्ट्स ने हिंद महासागर क्षेत्र में भू-राजनीतिक हलचल को तेज़ कर दिया है। ओमान की भौगोलिक स्थिति इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब स्थित है – यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है। इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति भारत, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है।

यदि चीन को ओमान में एक नौसैनिक सुविधा मिलती है, तो यह बीजिंग की महत्वाकांक्षी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति को और अधिक मज़बूती प्रदान करेगा। यह रणनीति हिंद महासागर के किनारे चीन के रणनीतिक ठिकानों और बंदरगाहों के नेटवर्क को संदर्भित करती है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में अपने आर्थिक और सैन्य प्रभाव को बढ़ाना है। इस तरह की एक सुविधा हिंद महासागर में भारत और अमेरिका के पारंपरिक प्रभुत्व और प्रभाव को सीधी चुनौती देगी।

वर्तमान में, भारत पहले से ही ओमान के दुक्म बंदरगाह का उपयोग लॉजिस्टिक समर्थन और नौसैनिक सहयोग के लिए करता रहा है, जो अरब सागर में भारत की सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण है। चीन की संभावित उपस्थिति इस क्षेत्र में एक गंभीर सुरक्षा दुविधा पैदा करेगी, जिससे समुद्री सुरक्षा को लेकर एक नई और तीखी प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।

चीन की बढ़ती सैन्य और नौसैनिक उपस्थिति क्षेत्र के प्रमुख खिलाड़ियों के लिए चिंता का विषय है, जिनमें भारत के अलावा अमेरिका, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। अमेरिका अपने प्रमुख व्यापार मार्गों और मध्य पूर्व में अपने सैन्य हितों की रक्षा के लिए इस क्षेत्र की स्थिरता को महत्वपूर्ण मानता है।

चीन का यह कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर तनाव बढ़ा सकता है और हिंद महासागर को एक नए भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट के रूप में स्थापित कर सकता है, जहाँ बड़ी शक्तियाँ अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से भारत को अपनी समुद्री निगरानी और रक्षा क्षमताओं को और अधिक मज़बूत करने की आवश्यकता होगी।