Breaking News in Hindi

संसद में स्वस्थ आलोचना की जगह बनी रहे

संसद का आगामी शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से शुरू हो चुका है। और इस महत्वपूर्ण समय से ठीक पहले, राज्यसभा सचिवालय ने एक बुलेटिन जारी किया है। यह बुलेटिन सांसदों के लिए क्या करें और क्या न करें की एक सूची है, जिसका उद्देश्य सदन के कामकाज को सुचारू बनाना है। हालांकि, बुलेटिन में शामिल एक विशेष प्रावधान बहस का विषय बन गया है: इसके अनुसार, सभापति के किसी भी निर्णय की आलोचना सदन के भीतर या बाहर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं की जानी चाहिए।

यह दिशानिर्देश संसदीय परंपराओं पर आधारित है। बुलेटिन स्पष्ट करता है कि सभापति पूर्व में स्थापित सदन के उदाहरणों के आधार पर निर्णय लेते हैं, और जहां ऐसे उदाहरण अनुपस्थित होते हैं, वहां सामान्य संसदीय परंपराओं का पालन किया जाता है। निःसंदेह, इस तरह के नियम सदन की कार्यवाही में अनुशासन और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं, लेकिन लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, यह सवाल उठता है कि क्या इसमें स्वस्थ आलोचना के लिए पर्याप्त जगह छोड़ी गई है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में, आलोचना और वाद-विवाद न केवल स्वीकार्य हैं, बल्कि यह संसदीय परंपरा का एक अविभाज्य अंग भी हैं। आलोचना को तब तक स्वागत योग्य माना जाना चाहिए जब तक कि वह किसी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या दुर्भावना से प्रेरित न हो। यदि किसी निर्णय या कार्यवाही में सुधार की गुंजाइश है, तो रचनात्मक आलोचना ही उसका मार्ग प्रशस्त कर सकती है। यही सिद्धांत देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर भी लागू होता है।

उदाहरण के लिए, न्यायपालिका के संबंध में भी यही स्थिति है। अदालत के फैसलों को चुनौती दी जा सकती है, उनके साथ असहमत हुआ जा सकता है, और उच्च न्यायालयों में उनके खिलाफ अपील दायर की जा सकती है। यह सब केवल इसलिए संभव है क्योंकि हमारे संविधान में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति व्यक्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

आलोचना और असहमति की इस स्वतंत्रता के बिना, किसी भी संस्था के लिए स्वयं को बेहतर बनाना असंभव हो जाता है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में, यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हर मुद्दे पर सहमति होगी। चुनावी राजनीति में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं। पिछले कुछ समय से देश में जो सियासी माहौल है, उसमें सदन के भीतर और बाहर टकराव और तनाव एक आम बात हो गई है।

ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं जहां विपक्ष और चेयर यानी पीठासीन अधिकारी के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। उदाहरण के लिए, पूर्व उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के कार्यकाल में यह तनाव स्पष्ट रूप से चरम पर था। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश की एक टिप्पणी को लेकर राज्यसभा की विशेषाधिकार समिति में चल रहा मामला इसी खींचतान का सीधा परिणाम है।

लोकतंत्र में, कोई भी व्यक्ति या संस्था आलोचना से परे नहीं हो सकती। आलोचना वास्तव में सुधार और बेहतरी का सबसे प्रभावी माध्यम है। राज्यसभा बुलेटिन में निहित आलोचना पर प्रतिबंध लगाने वाले प्रावधानों से यह संदेश जा सकता है कि सांसदों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाया जा रहा है। लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर यह संदेश अच्छा नहीं है। हालांकि, यह भी उतना ही सत्य है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, या आलोचना का अधिकार, कुछ आवश्यक सीमाओं के अधीन लागू होता है।

सभी सांसदों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति या आलोचना सदन की मर्यादा, गरिमा और नियमों के भीतर हो। व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप या दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों से बचना आवश्यक है ताकि सदन का माहौल स्वस्थ बना रहे। आगामी शीत सत्र सरकार और विपक्ष के संबंधों की एक नई कसौटी होगा। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के लिए यह राज्यसभा के सभापति के रूप में पहला सत्र है। उन्हें मॉनसून सत्र के कड़वे अनुभवों को ध्यान में रखना होगा। मॉनसून सत्र में राज्यसभा की उत्पादकता केवल 38.88 फीसद थी और सदन केवल 41.15 घंटे ही काम कर पाया था।

इस बार भी कई विवादास्पद मुद्दे, जैसे कि हालिया सुरक्षा चूक, एसआईआर जैसे मुद्दे गर्माए हुए हैं। नए सभापति सीपी राधाकृष्णन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदन में संतुलन स्थापित करने की होगी। उन्हें एक ओर सदन के नियमों और गरिमा को बनाए रखना है, और दूसरी ओर, विपक्ष को भी अपनी बात रखने और स्वस्थ आलोचना करने का पर्याप्त अवसर देना है। सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्हें सभी दलों के बीच विश्वास और सहयोग का माहौल बनाना होगा। संसदीय कार्यवाही की सफलता इसी संतुलन पर निर्भर करेगी, जहाँ नियमों का सम्मान हो, मगर रचनात्मक आलोचना के लिए भी दरवाज़े खुले रहें। वरना आलोचना को निंदा समझने की भूल देश की लोकतांत्रिक ढांचे को निरंतर कमजोर करती जा रही है और यह वर्तमान सरकार की ही विफलता है।