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पुणे के वैज्ञानिकों ने खोजी अलकनंदा गैलेक्सी

भारतीय खगोलविदों की खोज ने ब्रह्मांड के शुरुआती सिद्धांत को दी चुनौती

  • डार्क मैटर की सोच को बदल देता है यह

  • कैसे यह ब्रह्मांड बना, इस पर नई सोच है

  • इस गैलेक्सी का नाम एजीसी 20322 है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः भारत के पुणे स्थित इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष में एक अत्यंत दुर्लभ और विशाल सर्पिल गैलेक्सी की खोज करके खगोल विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस गैलेक्सी को अलकनंदा नाम दिया गया है। यह खोज ब्रह्मांड के गठन और विकास के मौजूदा सिद्धांतों को चुनौती दे रही है, क्योंकि यह गैलेक्सी ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में बनी हुई दिखाई देती है।

अलकनंदा (आधिकारिक पदनाम एजीसी 203022) इसलिए खास है क्योंकि इसकी संरचना एक विशाल सर्पिल गैलेक्सी की है, जिसमें अरबों तारे और गैस तथा धूल के बादल एक डिस्क जैसी आकृति में व्यवस्थित होकर सर्पिल भुजाएँ बनाते हैं।

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वर्तमान कॉस्मोलॉजिकल मॉडल सुझाव देते हैं कि शुरुआती ब्रह्मांड, जिसे बिग बैंग के बाद का युग माना जाता है, गैलेक्सी निर्माण के लिए बहुत अशांत था। इस दौरान बनने वाली गैलेक्सी आमतौर पर अनाकार या अंडाकार होती थीं, जिनमें सर्पिल जैसी स्थिर और जटिल संरचना विकसित होने के लिए पर्याप्त समय या शांत वातावरण नहीं था। सर्पिल गैलेक्सी (जैसे हमारी अपनी मंदाकिनी या मिल्की वे को आमतौर पर अपेक्षाकृत नए ब्रह्मांड की घटना माना जाता है।

आईयूसीएए की टीम ने इस गैलेक्सी का पता आर्काइवल डेटा और शक्तिशाली दूरबीनों के अवलोकन के माध्यम से लगाया है। अलकनंदा का अवलोकन दर्शाता है कि यह उस समय अस्तित्व में थी जब ब्रह्मांड अपनी वर्तमान आयु का लगभग एक चौथाई ही था। एक विशाल, जटिल और स्थिर सर्पिल गैलेक्सी का इतनी जल्दी विकसित हो जाना खगोलविदों को हैरान कर रहा है। यह इंगित करता है कि शुरुआती ब्रह्मांड में गैलेक्सी निर्माण की प्रक्रियाएँ शायद वर्तमान में मान्य सिद्धांतों की तुलना में अधिक तेज़ और कुशल थीं।

यह खोज वैज्ञानिकों को गैलेक्सी निर्माण के डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से संबंधित मॉडलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी। अलकनंदा जैसी गैलेक्सी का अध्ययन ब्रह्मांड के उन जटिल रहस्यों को सुलझाने में मदद कर सकता है कि कैसे पहली गैलेक्सी बनीं और कैसे उन्होंने समय के साथ विकसित होकर वर्तमान ब्रह्मांड का निर्माण किया। यह भारतीय शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी सफलता है और वैश्विक खगोल विज्ञान में उनका योगदान रेखांकित करती है।

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