म्यांमार सीमा पर भीषण तनाव की स्थिति और पूर्ण सतर्कता
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घायल सैनिक सैनिक अस्पताल लाये गये
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घटना के पीछे आतंकवादियों का हाथ है
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हिमंता ने 83 नरसंहार की फाइल खोली
भूपेन गोस्वामी
गुवाहाटीः मणिपुर के टेंग्नौपाल जिले में भारत-म्यांमार सीमा पर गश्त कर रहे असम राइफल्स के चार सैनिक आतंकवादियों की गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गए। यह हमला सैबोल गांव के पास बॉर्डर पिलर नंबर 87 के पास हुआ। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सैनिकों ने नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संयमित जवाबी कार्रवाई की। घायल जवानों को एयरलिफ्ट कर लेइमाखोंग के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस खुले बॉर्डर इलाके में अक्सर आतंकवादी गतिविधियाँ देखी गई हैं, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने इलाके में सर्च ऑपरेशन तेज कर दिए हैं और अतिरिक्त टुकड़ियाँ तैनात की गई हैं।
दूसरी ओर, असम की राजनीतिक परिदृश्य में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने हाल ही में 1983 की हिंसा से जुड़ी रिपोर्टों को विधानसभा में खोलकर 2026 के चुनावी समीकरणों को बदलने का दांव चला है। सरकार इस कदम को ‘असमिया पहचान’ और ‘अवैध प्रवासियों’ के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश कर रही है, जिससे उन्हें बहुसंख्यक वोट बैंक का ध्रुवीकरण करने में मदद मिल सकती है। पिछले चुनाव में मठों की जमीन से अतिक्रमण हटाना भी बीजेपी का प्रमुख मुद्दा रहा था। इस कदम से कांग्रेस और विपक्षी दलों पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है।
इसी बीच, हिमंत सरकार के कैबिनेट मंत्री बिमल बोरा ने एक विवादास्पद प्रस्ताव रखा है। निर्दलीय विधायक अखिल गोगोई के निलंबन के बाद, बोरा ने विधानसभा अध्यक्ष बिस्वजीत दैमारी से सदन परिसर के भीतर एक लग्जरी हिरासत केंद्रबनाने का आग्रह किया। बोरा का दावा है कि निलंबित विधायक बाहर जाकर सदन की कार्यवाही के बारे में मनमाने बयान देते हैं और ऐसा केंद्र उन्हें विधानसभा परिसर तक ही सीमित रखेगा, जिससे गलत नैरेटिव सेट होने से रोका जा सकेगा।
इन सब के बावजूद, राज्य भाजपा ने असम भूमि जोत सीमा निर्धारण (संशोधन) विधेयक, 2025 को चाय बागान श्रमिकों के लिए एक “ऐतिहासिक सफलता” बताया है। पार्टी का कहना है कि यह कानून 825 चाय बागानों के 3.33 लाख से अधिक परिवारों को लगभग 200 वर्षों से चले आ रहे भूमि अधिकारों से वंचित होने के दर्दनाक युग को समाप्त करेगा। इन सभी घटनाक्रमों को देखते हुए, आगामी 2026 के चुनाव में गठबंधन की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जहाँ क्षेत्रीय दलों का वोट बैंक और ‘असमिया पहचान’ का मुद्दा निर्णायक भूमिका निभाएगा।