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कनाडा के मंत्री ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया

तेल पाइप लाइन सौटे पर कई किस्म के आरोप लगे

ओटावाः कनाडा में प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल को एक बड़ा झटका लगा है, जब एक वरिष्ठ मंत्री ने बैंक ऑफ कनाडा के पूर्व गवर्नर मार्क कार्नी के साथ जुड़े एक विवादित तेल पाइपलाइन सौदे को लेकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे ने सत्ताधारी लिबरल पार्टी के भीतर पर्यावरण नीति और ऊर्जा विकास पर चल रहे गहरे मतभेद को उजागर कर दिया है, जिससे प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व पर दबाव बढ़ गया है।

इस्तीफा देने वाले मंत्री ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वह पर्यावरण की चिंताओं और स्वदेशी समुदायों के अधिकारों पर सौदे के संभावित नकारात्मक प्रभाव के कारण सरकार के निर्णय से असहमत थे। यह सौदा, जो कनाडा के ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था, एक नई ट्रांस-वेस्टर्न पाइपलाइन के निर्माण से संबंधित है। आलोचकों का तर्क है कि यह परियोजना कनाडा के जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को कमजोर करेगी और उस क्षेत्र को दूषित कर सकती है जहाँ कई प्रथम राष्ट्र (First Nations) समुदाय निवास करते हैं।

मार्क कार्नी, जो अब एक प्रमुख सरकारी आर्थिक सलाहकार हैं, ने इस सौदे की पुरजोर वकालत की थी, इसे कनाडा की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया था। हालांकि, मंत्री ने तर्क दिया कि तत्काल आर्थिक लाभ के लिए दीर्घकालिक पर्यावरणीय और नैतिक जिम्मेदारियों से समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उनका इस्तीफा एक सिद्धांत पर आधारित विरोध है।

यह घटना वर्तमान सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक संकट पैदा करती है, जिसे पारंपरिक रूप से जलवायु कार्रवाई के चैम्पियन के रूप में देखा जाता है। विपक्ष ने तुरंत इस इस्तीफे का इस्तेमाल करते हुए सरकार पर पर्यावरणवाद का मुखौटा पहनने और वास्तव में बड़े तेल हितों की सेवा करने का आरोप लगाया है। यह विवाद यह भी दर्शाता है कि कनाडा जैसे संसाधन-समृद्ध देशों में आर्थिक आवश्यकता और जलवायु अनिवार्यता के बीच संतुलन बनाना कितना मुश्किल है।

प्रधानमंत्री को अब इस खाली हुए पद को भरना होगा और अपनी पार्टी के भीतर के वातावरण समर्थक धड़े को शांत करना होगा, जबकि साथ ही साथ ऊर्जा उद्योग को यह आश्वासन देना होगा कि उनकी सरकार अभी भी विकास के लिए प्रतिबद्ध है। यह इस्तीफा यह स्पष्ट संदेश भेजता है कि कनाडा की राजनीति में पाइपलाइन और जलवायु नीति सबसे अधिक विभाजनकारी मुद्दे बने हुए हैं, और कोई भी सरकार इन चुनौतियों को आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकती है।