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बदलती क्षेत्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की परेशानी बढ़ी

तालिबान विदेश मंत्री के भारत दौरे से चिंता

काबुलः अगस्त 2025 में, अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री, आमिर खान मुत्ताकी, का भारत दौरा एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम रहा। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद यह काबुल से नई दिल्ली की पहली उच्च स्तरीय वार्ता थी। यह दौरा वैश्विक घटनाक्रम के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत की पड़ोसी पहले की कूटनीति में एक नया अध्याय जोड़ता है, जबकि साथ ही क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में पाकिस्तान की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाता है। इस यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने मानवीय सहायता, सुरक्षा चिंताओं और द्विपक्षीय व्यापार के भविष्य पर चर्चा की।

भारत ने औपचारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता और अपने रणनीतिक हितों को देखते हुए व्यावहारिक जुड़ाव बनाए रखना उसकी मजबूरी भी है और आवश्यकता भी। नई दिल्ली के लिए, अफगानिस्तान में अपने विकास परियोजनाओं की सुरक्षा, और सबसे महत्वपूर्ण, यह सुनिश्चित करना कि अफगान भूमि का उपयोग भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो, सर्वोपरि है। मुत्ताकी के दौरे ने भारत को सीधे तौर पर इन चिंताओं को उठाने का मौका दिया।

इस कूटनीतिक चाल से पाकिस्तान के सरकारी और मीडिया गलियारों में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। पाकिस्तान, जो लंबे समय से अफगानिस्तान में एक प्रमुख प्रभाव वाला देश रहा है, भारत और तालिबान के बीच सीधी वार्ता से असहज महसूस कर रहा है। तालिबान और पाकिस्तान सरकार के बीच सीमा पर बढ़ते तनाव और राजनीतिक मनमुटाव के बीच, भारत की एंट्री ने क्षेत्रीय समीकरणों को और जटिल बना दिया है।

इसके अलावा, चीन भी अफगानिस्तान में खनिज खनन और विकास परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिससे यह क्षेत्र बहुपक्षीय कूटनीतिक खींचतान का केंद्र बन गया है। भारत का यह कदम दिखाता है कि वह अफगानिस्तान में अपनी पारंपरिक पकड़ को पूरी तरह से नहीं छोड़ना चाहता और वह क्षेत्रीय भू-राजनीति में एक सक्रिय खिलाड़ी बना रहेगा। इस दौरे ने भविष्य में काबुल के साथ भारत के संबंधों की दिशा तय करने के लिए एक आधारशिला रखी है।