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दिल्ली-NCR की हवा का डबल अटैक! रात में क्यों बढ़ जाता है AQI? दिन में दमघोंटू हवा का क्या है कारण?

सर्दियां अभी ठीक से आई भी नहीं है कि दिल्ली-NCR का मौसम ज्यादा ही प्रदूषित हो गया है. लोग मास्क लगाकर निकल रहे हैं. ऐसा सालों से होता आ रहा है. सर्दी में न जाने कब तक ऐसा झेलना पड़ेगा? इस बीच में एक तथ्य और सामने आया कि रात में एयर क्वालिटी और खराब हो जाती है या यूं भी कह सकते हैं कि रात में एयर क्वालिटी सबसे ज्यादा खराब पाई जा रही है.

बीते 24 घंटों में दिल्ली का अधिकतम AQI 623 दर्ज किया गया. आठ नवंबर यानी आज सुबह सात बजे अधिकतम AQI 653 दर्ज किया गया है. जबकि सात नवंबर दोपहर चार बजे यह 175 दर्ज किया गया. रात के समय एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का बढ़ना भारत के कई शहरों, खासकर दिल्ली-एनसीआर में बार-बार देखा जाने वाला पैटर्न है. यह सिर्फ तापमान में कमी या वाहनों की संख्या से नहीं, बल्कि कई कारणों से ऐसा होता है.

आइए, समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर रात में AQI क्यों बढ़ता है? दिल्ली के संदर्भ में इसकी विशेषताएं क्या हैं? देश के अन्य हिस्सों में कौन-कौन से कारक प्रभाव डालते हैं?

क्यों होता है ऐसा?

दिन में सूर्य की गर्मी सतह के पास की हवा को गर्म करती है, जिससे वह ऊपर उठती है और प्रदूषण फैलाने वाले तत्व वर्टिकली मिक्स होते हैं. रात में ज़मीन तेजी से ठंडी हो जाती है, जिससे सतह के पास की हवा भी ठंडी और भारी हो जाती है. इस स्थिति को तापमान उलटाव (Temperature Inversion) कहते हैं. इस समय ऊपर की हवा अपेक्षाकृत गर्म और नीचे ठंडी होती है. गर्म परत एक ढक्कन की तरह काम करती है और प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को सतह के पास कैद कर देती है. नतीजा यह होता है कि PM2.5, PM10, NO2, CO जैसे प्रदूषक रात में सतह के पास जमा होकर AQI को खराब करते हैं, जबकि दिन के समय सूर्य निकलने के बाद मिक्सिंग बढ़ने पर AQI थोड़ा सुधरता है.

हवा की गति

रात के समय वायु वेग आमतौर पर कम हो जाता है. कम हवा का अर्थ है कि प्रदूषक फैलकर पतले नहीं होते, बल्कि एक छोटे क्षेत्र में सघन बने रहते हैं. उत्तर भारत में शरद से शीत ऋतु (अक्टूबरजनवरी) के दौरान अक्सर शांत हवाएं और ठंडी, शुष्क परिस्थितियां बनती हैं, जो स्टैग्नेशन (स्थिरता) को बढ़ाती हैं. दिल्ली-एनसीआर में यह प्रभाव अधिक तीव्र होता है क्योंकि यह क्षेत्र हिमालय की तलहटी, यमुना के मैदान, और शहरी घाटी जैसी भू-आकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित है.

कार्बन उज्सर्जन घटता नहीं

शाम के समय ऑफिस-आवागमन की पीक के बाद भी मालवाहक वाहन रात में अधिक चलते हैं, ताकि दिन के प्रतिबंधों और भीड़ से बचा जा सके. डीज़ल ट्रकों समेत अन्य वाहनों से ब्लैक कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है. कई इलाकों में रात में खाना पकाने, धातु-कचरा चुनाई, असंगठित ढाबों, और सड़क किनारे स्टॉलों में कोयला, लकड़ी, कचरे को जलाकर लोग जीवन को सरल बनाने का प्रयास करते हैं. कुछ छोटे एवं मध्यम उद्योग रात में लगातार चलते हैं. जहां निगरानी कम होती है, वहां रात में उत्सर्जन बढ़ने की शिकायतें आम हैं. नियमन के बावजूद, कुछ निर्माण स्थलों पर रात में काम चलता है, जिससे धूल और डीज़ल जेनरेटर का प्रदूषण बढ़ता है.

नमी, धुंध और बारीक कण बनते हैं वजह

रात में अपेक्षाकृत मौसम में नमी बढ़ती है. उच्च नमी PM2.5 कणों पर पानी की परत खींचकर उन्हें बड़ा दिखाती है, इससे धुंध बढ़ती है और AQI को अधिक खराब श्रेणी में धकेलती है. नाइट-टाइम केमिस्ट्री में NOx, SO2 और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) के रसायनिकी परिवर्तन से अमोनियम सल्फेट/नाइट्रेट जैसे कण बनते हैं, जो रात में PM2.5 को और बढ़ाते हैं.

ये फैक्टर भी कम जिम्मेदार नहीं

पराली दहन में अक्टूबरनवंबर महीने में पंजाब-हरियाणा से आने वाली धुआं-युक्त वायु-धाराएं रात में स्थिरता के साथ मिलकर AQI को बहुत खराब श्रेणी में धकेल देती हैं. ठंडी, शांत रातें और यमुना बेसिन की नमी, साथ में अत्यधिक वाहन घनत्व, ये सब रात में प्रदूषक फंसाने के लिए स्थितियां पैदा करती हैं.

शीतकालीन महीनों में मिक्सिंग हाइट बहुत कम (कभी-कभी 200-400 मीटर) रह जाती है, जबकि गर्मियों में यह 1000-2000 मीटर तक जा सकती है, जिससे रात का प्रभाव सर्दियों में ज्यादा दिखता है. उत्तर और मध्य भारत में दिल्ली-एनसीआर का पैटर्न रहता है. लेकिन दक्षिण भारत के तटीय शहर चेन्नई, विशाखापट्टनम आदि में समुद्री हवाओं का रात्रिकालीन पैटर्न अलग होता है. कभी-कभी भू-समुद्र ब्रीज़ के उलटाव से प्रदूषक तटीय पट्टी पर टिक जाते हैं, लेकिन, उत्तर भारत जैसी चरम स्थिति नहीं बनने पाती. देहरादून, शिलांग के आसपास घाटियों में इनवर्ज़न स्ट्रॉन्ग होता है, जिससे रात में प्रदूषक नीचे की परत में फंसते हैं और यहां भी तड़के AQI चरम पर देखा जा सकता है.

क्या यह केवल सर्दियों में होता है?

इसका सीधा जवाब है नहीं. गर्मियों में भी रात में इनवर्ज़न हो सकता है, पर उसकी तीव्रता कम होती है और मिक्सिंग हाइट बड़ी होने से प्रभाव अपेक्षाकृत हल्का रहता है. मानसून में नमी अधिक होती है, पर वर्षा और तेज़ हवाएं प्रदूषकों को धो या उड़ा देती हैं, इसलिए रात में AQI का उछाल कम देखा जाता है.

इसे कैसे रोकें?

भारी वाहनों के शहर में प्रवेश पर सख़्त समय-प्रबंधन और उत्सर्जन मानकों का पालन जरूरी है. निर्माण स्थलों पर रात में धूल नियंत्रण कवरिंग, एंटी-स्मॉग गन, व्हील-वॉश, मलबा ढकने आदि की व्यवस्था हो. असंगठित ईंधन दहन पर निगरानी तेज हो. कोयला, कचरा जलाने पर जुर्माना लगे और आम लोगों की पहुंच LPG/PNG तक आसान हो.

DG सेट के विकल्प के तौर पर ग्रिड विश्वसनीयता बढ़ाना, गैस-आधारित जेनसेट, बैटरी स्टोरेज का उपयोग समय की मांग है. छोटे एवं मध्यम उद्योगों के लिए लो-NOx बर्नर, स्क्रबर, फिल्टरिंग और रियल-टाइम एमिशन मॉनिटरिंग हो. मेकेनिकल रोड स्वीपिंग, नियमित वाटर स्प्रिंकलिंग, PUC मानकों का पालन, BS-VI वाहनों और स्वच्छ ईंधनों को बढ़ावा दिया जाए.

इस तरह हम पाते हैं कि रात में AQI का बढ़ना किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि वायुमंडलीय स्थितियां, स्थानीय और क्षेत्रीय उत्सर्जन और मौसमी-भौगोलिक कारकों की संयुक्त देन है. दिल्ली-एनसीआर में यह प्रभाव शरद और शीत ऋतु में सर्वाधिक दिखता है. देश के अन्य हिस्सों में भी स्थानीय संदर्भ के अनुसार रात का AQI बढ़ता है.

घाटियों में इनवर्ज़न, तटीय शहरों में ब्रीज़ पैटर्न, और औद्योगिक नगरों में रात की गतिविधियां भूमिका निभाती हैं. समाधान का रास्ता यही है कि डेटा आधारित प्रबंधन हो. रात, सुबह संवेदनशील समय पर लक्षित नियंत्रण किया जाए. स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और नागरिक, संस्थागत आचरण में छोटे-छोटे बदलाव किये जाएं.