त्वरित टिप्पणी
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न्यूयार्क से भारत तक साफ साफ पहुंचता संदेश
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पूंजी आधारित राजनीति का पराजय
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भारतीय राजनीति का पथ प्रदर्शक
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कुछ दिनों में देश में दिखेगा असर
रजत कुमार गुप्ता
न्यूयार्क के मेयर पद पर जोहरान मामदानी की जीत के डोनाल्ड ट्रंप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इस एक परिणाम से भारतीय राजनीति में भी बदलाव के संकेत देखने को मिल सकते हैं। दरअसल ममदानी ने वह चुनाव जीता है, जिसमें उन्हें सबसे फिसड्डी प्रत्याशी माना गया था। सभी प्रमुख घटक औऱ पूंजीपति घराने खुलकर उसका विरोध कर रहे थे।
इसके बाद भी सीधे संपर्क की बदौलत ममदानी सफलता के पायदान पर सबसे ऊपर पहुंचने में कामयाब रहे। इससे साफ हो जाता है कि प्रयास अगर निरंतर जारी रहे तो असली मतदाता प्रत्याशी की भावना को समझते हुए उसका समर्थन करते हैं। इस कोशिश में पूंजीवादी राजनीति भी धराशायी हो जाती है।
यही परिणाम ममदानी के चुनाव से देखने को मिलता है। दूसरे शब्दों में न्यूयॉर्क सिटी के डेमोक्रेटिक मेयर-इलेक्ट जोहरान मामदानी वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में एक सनसनी बन गए हैं। एक ऐसे देश में, जिसे अक्सर पूंजीवादी विचारधारा का गढ़ माना जाता है और जो उदार मुक्त बाजार के अपने मूलभूत आर्थिक सिद्धांत के लिए जाना जाता है, उनका पूंजीवाद की स्पष्ट वैचारिक आलोचना ने संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीति में हलचल मचा दी है।
उनके अभियान ने बहुत ही कम समय में गति पकड़ी, जिसका मुख्य कारण धनी समर्थक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की उनकी आलोचना और उनके द्वारा रखी गई कल्याणकारी मांगें थीं, जिनमें किराए की दरों को स्थिर करना, मुफ्त बस पास प्रदान करना, सार्वभौमिक बाल स्वास्थ्य सेवा, कामकाजी वर्ग के श्रम अधिकार आदि शामिल थे।
मामदानी को भारत-अमेरिकी हिंदू समूहों से आलोचना का सामना करना पड़ा है क्योंकि उन्होंने इस साल की शुरुआत में न्यूयॉर्क असेंबली बिल 6920 को सह-प्रायोजित किया था, जो रोजगार, आवास और सार्वजनिक आवास तक पहुंच के अवसरों में किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। यह बिल अमेरिका में उन दलितों का समर्थन करता है जो भारतीय डायस्पोरा के बीच जातिगत भेदभाव का शिकार होते हैं।
अमेरिकी राजनीति में मामदानी की उपस्थिति की सबसे खास विशेषता उनके उम्मीदवारी से शुरू हुई वैचारिक बहस है। जिसके परिणाम कुछ दिनों में भारतीय राजनीति तक भी आ पहुंचेंगे। वरना आज के दौर में भारत की राजनीति भी पूंजी आधारित हो चुकी है, जिसमें आम आदमी की सोच की कोई गुंजाइश नहीं बची। साथ ही अपने जीत के भाषण में पंडित नेहरू का उल्लेख कर ममदानी ने यह संकेत दे दिया है कि भारत में नेहरू के खिलाफ फैलाये गये जहर का दरअसल कोई प्रभाव नहीं होने वाला है।