एलआईसी निवेश-मामला उजागर होने के बाद सफाई क्यों
हाल ही में, द वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने भारत के सबसे बड़े संस्थागत निवेशक, भारतीय जीवन बीमा निगम के एक बड़े व्यापारिक समूह, अडानी समूह में किए गए निवेश पर सवाल खड़ा किया है। रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने एलआईसी को अडानी समूह में निवेश करने के लिए निर्देशित किया, खासकर तब जब वह समूह कर्ज़ और अमेरिका में जाँच का सामना कर रहा था।
एलआईसी द्वारा इन आरोपों का तुरंत और सख्त खंडन करना, न केवल कंपनी की स्वतंत्र निर्णय लेने की प्रक्रिया पर ज़ोर देता है, बल्कि भारत के वित्तीय क्षेत्र की मज़बूती पर उठ रहे सवालों का भी करारा जवाब है। एलआईसी ने अपने स्पष्ट बयान में कहा है कि अडानी समूह की कंपनियों में उसका निवेश पूरी तरह से स्वतंत्र है और विस्तृत उचित दिमागी कसरत के बाद बोर्ड-अनुमोदित नीतियों के अनुरूप किया गया है।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि एलआईसी एक सूचीबद्ध कंपनी है, जो लाखों पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करती है और कठोर नियामक दिशानिर्देशों के तहत काम करती है। यह तर्क देना कि सरकार का वित्तीय सेवा विभाग किसी विशिष्ट कॉर्पोरेट समूह में निवेश के लिए सीधे निर्देश दे सकता है, एलआईसी की संस्थागत स्वायत्तता और पेशेवर फंड प्रबंधन की दशकों पुरानी परंपरा पर सवाल उठाता है।
यह केवल अडानी में किए गए निवेश का मामला नहीं है, बल्कि एलआईसी जैसी बड़ी वित्तीय संस्था की पारदर्शिता और स्वायत्तता का प्रश्न है, जो भारत के आर्थिक ताने-बाने की रीढ़ है। एलआईसी के पास 41 लाख करोड़ की परिसंपत्तियाँ हैं और यह भारत का सबसे बड़ा संस्थागत निवेशक है। इसका पोर्टफोलियो अत्यधिक विविध है, जिसमें 351 से अधिक सूचीबद्ध स्टॉक, सरकारी बॉन्ड और कॉर्पोरेट ऋण शामिल हैं।
यह विविधीकरण ही जोखिम को नियंत्रित करने का मुख्य सिद्धांत है। आँकड़ों से पता चलता है कि एलआईसी का निवेश संतुलित है और किसी एक समूह पर अत्यधिक निर्भरता नहीं दिखाता। अडानी समूह में एलआईसी की इक्विटी होल्डिंग 60,000 करोड़ (4 फीसद) है, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज (1.33 लाख करोड़), आईटीसी (82,800 करोड़), एचडीएफसी बैंक और एसबीआई जैसे अन्य बड़े समूहों में इसका निवेश इससे अधिक है।
यह स्पष्ट करता है कि अडानी समूह एलआईसी की निवेश रणनीति का केवल एक हिस्सा है, न कि केंद्र बिंदु। इसके अलावा, अडानी समूह में एलआईसी का ऋण जोखिम भी समूह के कुल कर्ज़ के 2 फीसद से कम है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में जिस 570 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश का उल्लेख किया गया है, वह अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड में किया गया था, जिसके पास भारत की सर्वोच्च एएए क्रेडिट रेटिंग है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा सर्वोच्च रेटिंग प्राप्त कंपनी में निवेश करना, एक संस्थागत निवेशक के लिए बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित एक सतर्क और सुरक्षित निर्णय माना जाता है। केवल एलआईसी ही नहीं, बल्कि अमेरिका के ब्लैकरॉक, जापान के मिज़ुहो और जर्मनी के डीजेड बैंक जैसे कई अन्य प्रतिष्ठित वैश्विक फंड और बैंक भी हाल के महीनों में अडानी समूह के ऋण में निवेश कर चुके हैं। यह वैश्विक विश्वास समूह की वित्तीय स्थिरता और उसके बुनियादी ढाँचा परिसंपत्तियों की मज़बूती को रेखांकित करता है।
सूत्रों के हवाले से पता चलता है कि अडानी समूह का कुल ऋण (2.6 लाख करोड़) उसके वार्षिक परिचालन लाभ (90,000 करोड़) और नकदी (60,000 करोड़) से अच्छी तरह से समर्थित है, जो उसकी ऋण चुकाने की क्षमता को मज़बूत बनाता है। इस संदर्भ में, किसी एक रिपोर्ट के आधार पर एलआईसी के सुस्थापित निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाना न केवल पूर्वाग्रहित लगता है, बल्कि इसका उद्देश्य भारत के मज़बूत वित्तीय क्षेत्र की नींव को अस्थिर करना हो सकता है।
2014 से भारत की शीर्ष 500 कंपनियों में एलआईसी के निवेश मूल्य का दस गुना बढ़कर 1.56 लाख करोड़ से 15.6 लाख करोड़ हो जाना, इसके उत्कृष्ट फंड प्रबंधन और सफल निवेश निर्णयों का प्रमाण है। एलआईसी का बयान यह दर्शाता है कि यह कंपनी अपने लाखों पॉलिसीधारकों के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हुए, स्वतंत्र रूप से और उच्चतम स्तर के उचित परिश्रम के साथ अपने निवेश निर्णय लेती है।
यह भारत की संस्थागत मज़बूती और वित्तीय स्वायत्तता का प्रतीक है। वैश्विक मीडिया को संवेदनशील वित्तीय मामलों पर रिपोर्टिंग करते समय, तथ्यों की सटीकता और संस्थागत प्रक्रियाओं के सम्मान को बनाए रखना चाहिए, ताकि देश के वित्तीय संस्थानों की छवि और प्रतिष्ठा को अनुचित रूप से धूमिल न किया जा सके।
इसमें सवाल सिर्फ इस बात का है कि यह जानकारी एलआईसी द्वारा पहले देश की जनता को क्यों सार्वजनिक तौर पर नहीं दी गयी। अब अमेरिकी अखबार में रिपोर्ट आने के बाद जब इसकी पुष्टि हो गयी है तो यह सवाल भी स्वाभाविक है कि इससे पहले अमेरिकी माध्यमों से भारत तक आने वाली तमाम सूचनाओं की सत्यता से भारत सरकार परेशान क्यों हो रही है।