पंद्रहवी सदी में जलवायु परिवर्तन की नई जानकारी सामने आयी
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अंटार्कटिका क्षेत्र में हुआ था दोहरा विस्फोट
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वातावरण गैस और राख से ठंडा हो गया था
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बर्फ के पुराने नमूनों से इसकी पुष्टि हुई है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः अंटार्कटिक बर्फ ने खोला 15वीं सदी की ठंड का रहस्य: दोहरे ज्वालामुखी विस्फोट ने बदल दी थी दुनिया की जलवायु। नए वैज्ञानिक शोध में इसका खुलासा हुआ है। यह पाया गया है कि लगभग 600 साल पहले अंटार्कटिका में एक साथ दो बड़े ज्वालामुखी विस्फोट हुए, जिसके कारण कई दशकों तक चली पूरी दुनिया में शीत युग का दौर चला।
विज्ञान की दुनिया से एक ताज़ा और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। अंटार्कटिक बर्फ की परतों में दबे पुराने रहस्यों ने वैज्ञानिकों को एक ऐसे ऐतिहासिक जलवायु परिवर्तन के बारे में बताया है, जिसका सीधा संबंध आज से लगभग 600 साल पहले अंटार्कटिका में हुए एक बड़े ज्वालामुखी विस्फोट से है।
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हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार, 15वीं सदी में (विशेष रूप से 1458-59 ईस्वी के आसपास) एक विशाल ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था, जिसने वातावरण में भारी मात्रा में सल्फरयुक्त गैसें और राख को उत्सर्जित किया था। यह विस्फोट इतना बड़ा था कि इसने उत्तरी गोलार्ध में कई दशकों तक शीतलन की घटना को जन्म दिया, जिसे हम लघु हिम युग के एक चरण के रूप में जानते हैं।
वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड की बर्फ की कोर का विश्लेषण किया। ये बर्फ के नमूने हजारों वर्षों का जलवायु रिकॉर्ड अपने अंदर संजोए रखते हैं। बर्फ में फँसे हुए सल्फर कणों और अन्य रासायनिक संकेतों के अध्ययन से पता चला कि यह घटना केवल एक नहीं, बल्कि एक साथ फटे दो अलग-अलग ज्वालामुखियों का परिणाम थी।
यह निष्कर्ष पहले के मान्यताओं से अलग है, जिसमें माना जाता था कि यह शीतलन प्रशांत महासागर या इंडोनेशिया क्षेत्र के किसी एक ज्वालामुखी, जैसे कि माउंट समलास के विस्फोट के कारण हुई थी। हालांकि, समलास का विस्फोट लगभग 1257 ईस्वी में हुआ था, और नवीनतम शोध 1458-59 ईस्वी की एक अलग, लेकिन समान रूप से शक्तिशाली, घटना की ओर इशारा करता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि उस समय वायुमंडल में सल्फर एरोसोल की मात्रा बहुत अधिक थी। जब ज्वालामुखी फटते हैं, तो वे सल्फर डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं। यह गैस ऊपरी वायुमंडल (स्ट्रेटोस्फीयर) में जाकर सल्फ्यूरिक एसिड के छोटे कणों (एरोसोल) में बदल जाती है। ये एरोसोल सूर्य की रोशनी को अंतरिक्ष में वापस परावर्तित कर देते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह ठंडी हो जाती है, एक ऐसी घटना जिसे ज्वालामुखी शीतकालीन कहा जाता है।
यह खोज वैज्ञानिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि कैसे प्राकृतिक घटनाएं, विशेष रूप से एक साथ होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट, वैश्विक जलवायु पर दीर्घकालिक और व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं। 15वीं सदी की यह शीतलन घटना न केवल उस समय के मौसम और फसलों पर असर डालती थी, बल्कि इसने समुद्री धाराओं और बर्फ के विस्तार को भी प्रभावित किया होगा, जिससे शीतलन प्रभाव दशकों तक बना रहा।
इस तरह के ऐतिहासिक जलवायु डेटा का अध्ययन करके, वैज्ञानिक भविष्य में ज्वालामुखी विस्फोटों के संभावित जलवायु प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने और उसका अनुमान लगाने में सक्षम हो सकते हैं। यह शोध हमें यह भी याद दिलाता है कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली कितनी जटिल है और कैसे दूर-दराज की घटनाएं भी पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित कर सकती हैं।
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