कैमरून में पॉल बिया का सत्ता प्रेम जारी है
याऊंडेः कैमरून एक महत्वपूर्ण राष्ट्रपति चुनाव हुआ, जिसने एक बार फिर वैश्विक सुर्खियाँ बटोरीं। यह चुनाव अफ्रीका के सबसे उम्रदराज नेता – और विश्व के सबसे वृद्ध वर्तमान राष्ट्रपति – पॉल बिया को और सात साल के लिए अपनी सत्ता की बागडोर संभालने का अवसर दे सकता है।
यदि बिया इस चुनाव में विजयी होते हैं, तो 92 वर्ष की वर्तमान आयु वाले यह नेता, अपने कार्यकाल के अंत तक 99 वर्ष के हो जाएंगे। विश्लेषकों और राजनीतिक पंडितों ने बड़े पैमाने पर मौजूदा राष्ट्रपति पॉल बिया की जीत की भविष्यवाणी की है, जो कैमरून की राजनीतिक स्थिरता (या कुछ लोगों के अनुसार, जड़ता) को दर्शाती है।
बिया पहली बार 1982 में कैमरून के पहले राष्ट्रपति अहमदौ आहिदजो के इस्तीफे के बाद सत्ता में आए थे। तब से, लगभग चार दशकों से अधिक समय से वह देश पर शासन कर रहे हैं। इस लंबी अवधि में, बिया को लगातार सात चुनावों में विजेता घोषित किया गया है, जो उनकी पार्टी की मजबूत पकड़ और विपक्ष की कमजोर स्थिति को दर्शाता है।
1960 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से कैमरून ने केवल दो ही नेताओं का शासन देखा है, जो इस मध्य अफ्रीकी राष्ट्र में सत्ता के केंद्रीकरण की कहानी कहता है।
हालांकि, इस बार बिया की छवि में कुछ दरारें दिखाई दे रही हैं। उनकी लंबी अनुपस्थिति और स्वास्थ्य संबंधी अटकलों ने विपक्ष को मजबूत आधार दिया है। बिया अपना अधिकांश समय यूरोप में बिताते हैं, जिससे देश का दैनिक शासन प्रमुख पार्टी अधिकारियों और परिवार के सदस्यों के हाथों में रह जाता है।
इस चुनाव में बिया को नौ विपक्षी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें उनके कुछ पूर्व सहयोगी और नियुक्त व्यक्ति भी शामिल हैं। विपक्षी खेमे से, सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और सांसद जोशुआ ओसिह ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।
2018 के चुनाव में चौथे स्थान पर रहे ओसिह ने विशेष रूप से मतदान में धांधली (voter fraud) की आशंका जताई है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वोटों की गिनती की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से लंबी और थकाऊ होगी, जो प्रक्रिया की जटिलता और पारदर्शिता के अभाव को उजागर करती है।
कैमरून में मतदान का केवल एक ही दौर होता है, जिसमें सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित होता है। इस प्रणाली के कारण, विपक्ष का मानना है कि सत्ताधारी दल के लिए चुनावी नतीजों में हेरफेर करना आसान हो जाता है, जिससे चुनावों के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने पर सवाल खड़ा होता है। इस चुनाव का परिणाम 26 अक्टूबर तक आने की उम्मीद है।