मेरी आवाज सुनो की पुकार किसी और ने नहीं बल्कि रूस के शक्तिशाली राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने लगायी है। बेचारे डोनाल्ड ट्रंप बहुत आस लगाकर बैठे थे पर नोबल कमेटी ने उनकी दावेदारी को इस बार के लिए खारिज कर दिया। यह सरासर बेइमानी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश की है, जिसके केंद्र में युद्ध रुकवाने और लाखों लोगों की जान बचाने के उनके दावे हैं। हालांकि, उन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार नहीं मिला है, जिस पर व्हाइट हाउस ने औपचारिक तौर पर नाराज़गी भी जताई है, और इस पूरे घटनाक्रम को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अप्रत्याशित समर्थन से और बल मिला है।
ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सात से आठ युद्धों को रुकवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें रूस-यूक्रेन संघर्ष को सुलझाने की पहल और मध्य-पूर्व में शांति प्रयासों का ज़िक्र प्रमुख है।
उनका मानना है कि लोगों के जीवन की रक्षा करना ही उनके लिए सबसे बड़ा नोबेल है। नोबेल समिति द्वारा उनके प्रयासों को अनदेखा किए जाने पर उन्होंने अक्सर अपनी निराशा व्यक्त की है, यहाँ तक कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को उनके कार्यकाल के शुरुआती चरण में ही पुरस्कार मिलने पर भी सवाल उठाए हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से ठीक पहले व्हाइट हाउस ने ट्रंप की एक तस्वीर साझा करते हुए उन्हें शांति का राष्ट्रपति करार दिया था, जो उनकी दावेदारी के प्रति प्रशासन के दृढ़ विश्वास को दर्शाता है। इस बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ट्रंप की नोबेल पुरस्कार की दावेदारी का खुले तौर पर समर्थन करके अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया।
रूस ने विशेष रूप से यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के ट्रंप के प्रयासों को सराहा और कहा कि उनका नामांकन वैश्विक शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम होगा। रूस का यह समर्थन भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका और रूस के बीच कई मुद्दों पर तनाव रहा है। कुछ विश्लेषक इसे रूस द्वारा अमेरिका के आंतरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाने के प्रयास के रूप में भी देखते हैं, जबकि अन्य इसे शांति प्रयासों की सराहना मानते हैं।
ट्रंप को पुरस्कार न मिलने के पीछे नोबेल समिति की कसौटी को एक कारण माना जाता है। समिति उन प्रयासों को देखती है जो स्थायी शांति लाते हों और मानवाधिकारों को बढ़ावा देते हों। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि व्यापारिक धमकियों या अस्थाई समझौतों पर आधारित युद्धविराम को समिति स्थायी शांति के रूप में नहीं देखती।
इन तमाम दावों और समर्थन के बावजूद, 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की लोकतंत्र समर्थक नेता मारिया कोरिना मचाडो को दिया गया। इसी बात पर एक पुरानी फिल्म नौनिहाल का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था कैफी आजमी ने और संगीत में ढाला था मदन मोहन ने। इसे मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। यूं तो यह देशभक्ति से प्रेरित गीत है पर इस माहौल में भी यह गीत फिट प्रतीत होता है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
मेरी आवाज़ सुनो, प्यार के राज़ सुनो
मैंने एक फूल जो सीने पे सजा रखा था
उसके परदे मैं तुम्हे दिल से लगा रख्ह था
था जुदा सबसे मेरे इश्क़ का अंदाज़ सुनो
ज़िन्दगी भर मुझे नफ़रत सी रही अश्कों से
मेरे ख्वाबों को तुम अश्कों में डुबोते क्यों हो
जो मेरी तरह जिया करते हैं कब मरते हैं
थक गया हूँ मुझे सो लेने दो रोते क्यों हो
सो के भी जागते ही रहते हैं जाँबाज़ सुनो …
मेरी दुनिया में ना पूरब है ना पश्चिम कोई
सारे इन्सान सिमट आये खुली बाहों में
कल भटकता था मैं जिन राहों मैं तन्हा तन्हा
काफ़िले कितने मिले आज उन्हीं राहों मैं
और सब निकले मेरे हमदर्द मेरे हमराज़ सुनो …
नौनिहाल आते हैं अरथी को किनारे कर लो
मैं जहाँ था इन्हें जाना है वहाँ से आगे
आसमाँ इनका ज़मीं इनकी ज़माना इनका
हैं कई इनके जहाँ मेरे जहाँ से आगे
इन्हें कलियां ना कहो हैं ये चमनसाज़ सुनो …
क्यों सँवारी है ये चन्दन की चिता मेरे लिये
मैं कोई जिस्म नहीं हूँ के जलाओगे मुझे
राख के साथ बिखर जाऊंगा मैं दुनिया में
तुम जहाँ खाओगे ठोकर वहीं पाओगे मुझे
हर कदम पर है नए मोड़ का आग़ाज़ सुनो …
खैर सवाल सिर्फ नोबल पुरस्कार का ही नहीं है। देश में भी बिहार चुनाव को लेकर घमासान की स्थिति है। एनडीए की पूरी जिम्मेदारी फिर से नरेंद्र मोदी पर है जबकि नीतीश कुमार के मानसिक स्वास्थ्य पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। दूसरी तरफ मीडिया के एक वर्ग के निरंतर प्रचार के बाद भी इंडिया एलाइंस एकजुट है। लिहाजा इन दोनों पक्षों के बीच प्रशांत किशोर का होना एक नये समीकरण को जन्म दे सकता है।