वैश्विक व्यापार युद्ध में अमेरिकी टैरिफ का दांव पिछले 1 अक्टूबर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ब्रांडेड और पेटेंट दवाओं के आयात पर 100 फीसद टैरिफ लगाने की घोषणा ने वैश्विक स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। इस कदम से अमेरिका में स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया है, जहाँ घरेलू चिकित्सा खर्च का लगभग 10 फीसद हिस्सा डॉक्टर द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं पर खर्च होता है।
ट्रंप प्रशासन का यह निर्णय मुख्य रूप से अमेरिका में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया गया प्रतीत होता है, लेकिन इसके दूरगामी और जटिल परिणाम सामने आ सकते हैं। इस उच्च टैरिफ का सबसे गंभीर असर उन मरीज़ों पर पड़ने की संभावना है, जिन्हें विशेष कैंसर या दुर्लभ बीमारियों की दवाओं की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि इन दवाओं की उपलब्धता और कीमतें सीधे तौर पर प्रभावित होंगी।
अमेरिकी स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र पर भी इस टैरिफ वृद्धि का गहरा असर पड़ने की आशंका है। बीमा कंपनियाँ स्वाभाविक रूप से विशेष और पेटेंट दवाओं की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ सीधे पॉलिसीधारकों पर डालने की कोशिश करेंगी। फिलहाल, भारत का विशाल जेनेरिक उद्योग इस तात्कालिक टैरिफ वृद्धि से बचा हुआ है।
अमेरिका में वितरित दवाओं में जेनेरिक दवाओं का हिस्सा मात्रा के हिसाब से लगभग 90 फीसद है, हालांकि खर्च के मामले में यह हिस्सा केवल 13 फीसद है। यही कारण है कि जेनेरिक या बायोसिमिलर दवाओं को शामिल करने के लिए यदि टैरिफ का विस्तार किया जाता है, तो यह भारत के सबसे सफल निर्यात क्षेत्रों में से एक के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
श्री ट्रंप का यह कदम प्रभावशाली संस्था, फार्मास्युटिकल रिसर्च एंड मैन्युफैक्चरर्स ऑफ अमेरिका की आपत्तियों के बावजूद आया है। जिसने यह चेतावनी दी थी कि टैरिफ संरचनात्मक आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं का समाधान किए बिना ही मरीजों की लागत को अनावश्यक रूप से बढ़ा देंगे।
अमेरिकियों के लिए, यह निर्णय उन्नत चिकित्सा पद्धतियों के लिए खुदरा दवाओं की कीमतों को लगभग निश्चित रूप से बढ़ा देगा। दुनिया के लिए, यह कदम एक स्पष्ट चेतावनी है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था में निर्मित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ अब नई राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार आकार ले रही हैं। यह आवश्यकता अब भारत के फार्मा क्षेत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है, जहाँ निर्यात बाज़ारों की स्थिरता सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है।
ऐसे नाजुक वैश्विक व्यापार मौके पर, जब भारत के फार्मा उद्योग के सामने अपने निर्यात आधार को मजबूत करने और स्वास्थ्य पर्यटन में एक वैश्विक शक्ति बनने का सुनहरा अवसर था, एक गंभीर घरेलू त्रासदी सामने आ गई है: नकली और ज़हरीले कफ सिरप का मामला। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में इस कफ सिरप की चपेट में आकर अब तक 12 बच्चों की मौत हो चुकी है।
इससे पहले भी कई अन्य देशों से भारतीय कफ सिरप से जान जाने की शिकायतें आ चुकी थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश, सरकारी महकमा या तो इसे बहुत हल्के में लेता रहा, या फिर चांदी के जूतों की मार यानी भ्रष्टाचार और घूसखोरी ने जिम्मेदार अफसरों को चुप करा दिया। यह स्थिति दर्शाती है कि देश के भीतर नियामक और प्रवर्तन तंत्र कितना लचर और भ्रष्टाचार-ग्रस्त है।
भारत में चिकित्सा उपचार अमेरिका के मुकाबले काफी सस्ता है। इस कारण, भारत को अपनी विदेशी मुद्रा कमाने के लिए स्वास्थ्य पर्यटन का लाभ उठाना चाहिए। दक्षिण भारत के आयुर्वेदिक संस्थान पहले से ही ऐसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी चिकित्सा पद्धति तथा अन्य नियम काफी कठोर हैं। देश के कई शहरों में समय-समय पर हुई जाँच में भी नकली दवाइयों का पता चला है, पर इसके लिए जिम्मेदार असली लोगों को कठोर दंड मिलने की सूचनाएँ कम ही आती हैं।
भारत को यदि स्वास्थ्य पर्यटन के क्षेत्र से भी आमदनी का नया रास्ता खोलना है, तो उसे सबसे पहले दवा के स्तर को कठोरता के साथ स्थिर रखने के वैज्ञानिक मानदंडों का पालन करना होगा। दवा की गुणवत्ता से समझौता, चाहे वह निर्यात के लिए हो या घरेलू उपयोग के लिए, देश की वैश्विक साख को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है और अंततः मानव जीवन के लिए घातक सिद्ध होता है। जब देश की नियामक संस्थाएँ भ्रष्टाचार के दलदल में फँसी हों, तो ऐसे वैश्विक संकट के समय में मिलने वाले आपदा में अवसर को गँवाने की पूरी संभावना बन जाती है। अब इस नये अवसर का फायदा उठाने की दिशा में दवा के गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी सरकार पर है। सरकार अगर दिल से चाहे तो इस आपदा में भी कमाई के नये अवसर प्राप्त हो सकते हैं।