मानसून 8 फीसद अधिक बारिश के साथ समाप्त
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारतीय मानसून का मौसम (जून से सितंबर) आधिकारिक तौर पर 8% की अधिक वर्षा के साथ संपन्न हुआ है, जिसे भारत मौसम विज्ञान विभाग ने सामान्य से ऊपर की श्रेणी में रखा है। यह एक ऐसी ख़बर है जो देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सकारात्मक संकेत है।
कुल मिलाकर अधिक बारिश होने से खरीफ की प्रमुख फसलों, जैसे धान, दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे ग्रामीण आय और उपभोक्ता मांग को बढ़ावा मिलेगा। इसके अतिरिक्त, इस अतिरिक्त जल से देश के प्रमुख जलाशयों (बांधों) में पर्याप्त पानी जमा हो गया है, जो रबी की फसलों (सर्दियों में बोई जाने वाली) की सिंचाई और शहरों की पेयजल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, इस समग्र रूप से सकारात्मक शीर्षक के भीतर एक गंभीर क्षेत्रीय विषमता छिपी हुई है। आईएमडी की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जहाँ मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में भारी वर्षा दर्ज की गई, वहीं पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई क्षेत्रों में सामान्य से कम, यानी सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में वर्षा की कमी ने स्थानीय किसानों के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर दिया है।
इन क्षेत्रों में वर्षा की कमी के कारण धान (चावल) की खेती पर सीधा असर पड़ा है, जो इन राज्यों की मुख्य फसल है। किसानों को अपनी फसलों को बचाने के लिए महंगे निजी सिंचाई विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है और उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव पड़ रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो सूखे के कारण फसल की बुवाई भी नहीं हो पाई है।
यह स्थिति भारत सरकार और राज्य सरकारों के लिए एक दोहरी चुनौती पेश करती है। एक ओर, उन्हें देश के मध्य हिस्सों में जल-जमाव और बाढ़ प्रबंधन पर ध्यान देना है, वहीं दूसरी ओर, उन्हें पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में तत्काल सूखा राहत, वैकल्पिक सिंचाई योजनाओं और किसानों के लिए आर्थिक सहायता पैकेज उपलब्ध कराने होंगे।
जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून अब और अधिक अनिश्चित और क्षेत्रीय रूप से असमान होता जा रहा है। इसलिए, जल संरक्षण और संचयन के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ बनाना समय की मांग है, ताकि भविष्य में इस तरह की क्षेत्रीय जल संकटों का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके।