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जले भवन के सामने तंबु में सुप्रीम कोर्ट

जनविद्रोह के बाद अब नेपाल में न्याय की अग्नि परीक्षा

राष्ट्रीय खबर

काठमांडूः नेपाल में हाल ही में हुए छात्र-युवाओं के हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने न केवल राजनेताओं के घरों और संपत्तियों को निशाना बनाया, बल्कि देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च गढ़, सुप्रीम कोर्ट की इमारत को भी पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया।

यह हमला देश की लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था पर एक गंभीर प्रहार था, जिसने नेपाल के भविष्य पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस विनाशकारी घटना के बाद, न्याय के पहियों को फिर से चलाने के लिए सोमवार सुबह सुप्रीम कोर्ट परिसर में सफेद तंबू लगाकर अस्थाई तौर पर कामकाज शुरू किया गया, जिन पर सुप्रीम कोर्ट नेपाल लिखा हुआ था।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रकाश मान सिंह राउत ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए भी यह स्पष्ट किया कि नेपाल की न्यायपालिका अपनी निरंतरता बनाए रखेगी। उन्होंने दृढ़ता से कहा, हम हर हाल में न्याय के मार्ग पर चलेंगे। अदालत का काम नहीं रुकेगा। उनका यह बयान उस कठिन समय में न्याय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील पूर्णमन शाक्य ने इस घटना के विनाशकारी परिणामों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि आग लगने से लगभग 62,000 मुकदमों के रिकॉर्ड नष्ट हो गए हैं। इन दस्तावेजों के खो जाने से न्याय प्रक्रिया में कई तरह की जटिलताएं पैदा होंगी। शाक्य ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायपालिका के कई अमूल्य और ऐतिहासिक दस्तावेज अब कभी भी बहाल नहीं किए जा सकेंगे, जिससे देश के कानूनी इतिहास को भारी क्षति पहुंची है।

इस संकट के बीच, नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने, जिन्होंने तीन दिन पहले ही अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कमान संभाली थी, न्यायपालिका के पुनर्निर्माण का आह्वान किया है। उनकी नेतृत्व क्षमता पर सबकी नजरें टिकी हैं कि वे इस मुश्किल समय में कैसे देश को स्थिरता की ओर ले जाती हैं।

हमले के बाद, सुप्रीम कोर्ट परिसर में जली हुई बाइक और कारों के मलबे के बीच सफेद तंबू लगाए गए थे। नेपाल बार एसोसिएशन के महासचिव केदार प्रसाद कोइराला ने बताया कि इन अस्थायी ठिकानों पर केवल जरूरी मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जा रही है। यह स्थिति दिखाती है कि भले ही न्यायपालिका का भौतिक ढाँचा नष्ट हो गया हो, लेकिन न्याय प्रदान करने की भावना अभी भी जीवित है। यह संकट नेपाल के सामने न्यायपालिका की सुरक्षा और उसकी स्थिरता सुनिश्चित करने की एक बड़ी चुनौती पेश करता है।