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*पाठ्यक्रम का हिस्सा हो श्मशान
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*चिताओं की लपटों से ही पुनर्जीवित होगी संवेदना
प्रकाश सहाय
” तुमको शपथों से बड़ा प्यार
तुमको शपथों की आदत है “..
लगभग आठ दशकों से इस ” प्यार और आदत ” का सिलसिला अनवरत जारी है …कोई राष्ट्रपति भवन में शपथ लेता है तो कोई राजभवन में .. कोई विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में तो कोई कभी मैदान के राजशाही पंडाल में ! हुजूर हाकिम नेता मंत्री अधिकारी ईश्वर की शपथ लेते हैं..संविधान द्वारा स्थापित विधि की अक्षुण्ण रखने की लेते हैं …चिकित्सक हिप्पोक्रेटिक शपथ लेते हैं ..सभी महानुभाव बड़े प्यार से..उमंग तरंग जोश से …निस्वार्थ सेवा, करुणा,मानव कल्याण की कसमें खाकर ..
लेकिन कुछ ही दिनों में इन शपथों से उनका मोह भंग हो जाता है ..शपथों का मर्म मर जाता है मिट जाता है ..अब भला यूनानी चिकित्सक हिपोक्रेट्स के नाम का शपथ भारत की भूमि पर कितना असरदार होगा .. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने चरक का नाम सुझाया है …
यहीं पर कवि भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां बेहद प्रासंगिक लगती हैं :
” है शपथ ग़लत, है शपथ कठिन
ली शपथ किसी ने और किसी के
आफ़त पास सरक आई
तुमको शपथों से प्यार मगर
तुम पर शपथें छाई – छाईं ।”
मन में आज बात उठती है ..क्यों न उच्च पदों पर आसीन समाज की अग्रिम पंक्ति के महानुभावों के शपथ और प्रशिक्षण में एक और हिस्सा जोड़ दिया जाय…
वे श्मशान में भी शपथ लें..वहां जलती चिताओं की लपटों का…बिखरी राख और धुआं को साक्षी मान कर ..
” ये ज्ञान भूमि है
मृत्यु ही सत्य है ”
मुक्तिधाम में जलती चिताओं की लपटें वहां की दीवारों पर लिखे शब्दों – कथनों को अद्भुत रूप से उजागर करती हैं..
उन लपटों की रोशनी सूर्य से भी प्रखर जान पड़ती हैं …
जीवन के मर्म को समेटे कबीर रहीम नानक के दोहे और भारतीय दर्शन के वाक्य सीधे हृदय पर अंकित हो जाते हैं ..
जलती चिता के इर्द गिर्द खड़े लोग थोड़े समय के लिए ही सही…जीवन के सत्य को पूरी तरह अनावृत देख लेते हैं..
मिथ्या जगत के सत्य का अंतिम पाठ पढ़ाते मुक्तिधाम की दीवारों पर लिखी बातें दिल दिमाग पर हथौड़े सी चोट करती हैं..जिसे अस्वीकार करना मानव सामर्थ्य से बाहर की बात होती है ..अनंत विस्तार लिए उस परिसर से बाहर का संसार वहां आकर सिमट सा जाता है ..
अट्टालिकाएं, महल..शान शौकत ..सत्ता..रुपया पैसा सोना चांदी अमीरी गरीबी सब एक छोटे से शून्य में समा जाता है ..
विचित्र बात है कि जीवन का मर्म तब सामने आता है जब जीवन समाप्त होता है …
कबीर ने यूं ही नहीं कहा था :
” माटी कहे कुम्हार से
तू क्या रौंदे मोय
एक दिन ऐसा आयेगा
मैं रौदूंगी तोय “
श्मशान की दीवार पर यह भी लिखा है :
” स्वार्थ अहंकार एवं लापरवाही का बढ़ जाना
मानव पतन का कारण है ”
अहंकार,स्वार्थ,लोभ,
संग्रह,सत्ता शक्ति सब विलय हो जाता है…सब जल कर राख ..सिर्फ बिखरी राख के साथ धुआं ही धुआं …फिर क्यों मची है समाज में आपाधापी..
श्मशान की दीवारों पर लिखा रहीम का यह दोहा अब धुंधलाने लगा है ..
” तरुवर फल नहिं खात हैं सरवर पियहिं न पान
कहि रहीम परकाज हित
संपति – सचहिं सुजान ”
मुक्तिधाम के एक कोने में यह भी लिखा है :
” मनुष्य है वही कि
जो मनुष्य के लिए मरे ”
क्या शिव इसलिए भस्म लपेट कर रखते हैं..क्या इसलिए बाघम्बर धारण करते हैं …क्या इसलिए विषपान किया कि मानवता जीवित रहे..
जीवन के मर्म को महादेव ने साक्षात आत्मसात किया और मुक्तिधाम को सत्य की पाठशाला बना कर रख दिया …
” खाली हाथ आए
खाली ही जाना
कुछ कर्म करें इन हाथों से
शेष रहें अमर रहें ”
समाज का कायाकल्प हो जाएगा अगर समाज के अग्रिम पंक्ति के “महानुभाव ” श्मशान की पाठशाला के विद्यार्थी बनें ..इसके दीवारों पर लिखे जीवन दर्शन के सत्य का पाठ समझ जाएं …

हुजूर हाकिम नेता मंत्रियों के दौरे में श्मशान दौरा को अनिवार्य बनाया जाय.. ..कम से कम सप्ताह में एक बार…जिससे वे मानवता प्रशिक्षण के क्रम में जलती चिताओं के साथ दीवार पर लिखे जीवन सत्य को आत्मसात कर सकें ..वैसे उद्घाटन के लिए सदैव लालायित रहने वाले हुजूर हाकिम दशकों बाद भी विद्युत शव दाहगृह का लाल फीता काटने का साहस नहीं जुटा पाए …यह विद्युत शव दाहगृह का भवन जर्जर हो कर ढह गया …
मिटती मरती संवेदना को पुनर्जीवित करने का एकमात्र विकल्प है निरंतर श्मशान यात्रा जीवित अवस्था में ..
आईएएस अधिकारियों के प्रशिक्षण में हर तरह के प्रशिक्षण होते है ..15 दिन गांव में भी बिताना पड़ता है…15 दिन आर्मी अटैचमेंट भी होता है जहां वे बॉर्डर पर बंकरों में रहते हैं …फिर श्मशान अटैचमेंट से क्या गुरेज !
नेता मंत्री अधिकारी के साथ डॉक्टर,व्यवसायी, अभियंता.. शिक्षक
वकील..जज साहब को भी श्मशान के इस पाठ्यक्रम को समझना बेहद जरूरी है ..
पत्थर की लकीर की तरह यह सच है कि हृदय श्मशान के पाठ से ही जागृत होगा…
जलती चिताओं की लपटें और बिखरी बुझी राख से ही मरती मिटती संवेदना पुनर्जीवित हो सकेंगी …
